Manviya Karuna Ki Divya Chamak | मानवीय करुणा की दिव्य चमक | कक्षा 10 |

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Manviya Karuna Ki Divya Chamak | मानवीय करुणा की दिव्य चमक | कक्षा 10 | पाठ 13 | क्षितिज भाग 2 |  हिंदी अ | सर्वेश्वर दयाल सक्सेना |

लेखक का जीवन परिचय

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का जन्म 15 सितंबर  1927 में  उत्तर प्रदेश के बस्ती नामक स्थान पर हुआ था | इन्होंने अपनी उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्राप्त की थी | इन्होंने अध्यापक, आकाशवाणी में सहायक प्रोड्यूसर,  दिनमान पत्रिका के उप संपादक और पराग पत्रिका के संपादक के पद पर कार्य किया |  23 सितंबर, 1983 में इनका आकस्मिक निधन हो गया |

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना एक बहुमुखी प्रतिभा के साहित्यकार थे | उन्होंने साहित्य के विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट  लेखन कार्य किया | वह कहानीकार उपन्यासकार निबंधकार और नाटककार भी थे |

वर्णित विषय

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना एक ऐसे साहित्यकार थे जिन्होंने  अपनी रचनाओं में मध्यमवर्गीय आकांक्षाओं को स्वर दिया  मध्यमवर्गीय जीवन की आकांक्षाओं सपनों संघर्ष शोषण हताशा और कुंठा का चित्रण उनके साहित्य में विशेष रूप से मिलता है  वे एक ऐसे साहित्यकार थे जो सत्य को घुमा फिरा कर नहीं बल्कि स्पष्टता के साथ में सीधे-सीधे कह देते थे

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की रचनाएं

  • कविता संग्रह –  काठ की घंटियां , कुआनो  नदी , जंगल का दर्द ,  खूंटियों पर टंगे लोग l
  • उपन्यास – पागल कुत्तों का मसीहा , सोया हुआ जल ,उड़े हुए रंग (उपन्यास) यह उपन्यास सूने चौखटे नाम से 1974 में प्रकाशित हुआ था) ।
  • कहानी संग्रह – लड़ाई , अंधेरे पर अंधेरा l
  • नाटक – बकरी , अब गरीबी हटाओ l
  • बाल साहित्य –   बतूता का जूता , महंगू की टाई , भों-भों खों-खों , लाख की नाक l
  • यात्रा संस्मरण – कुछ रंग कुछ गंध l

अन्य रचनाएं

  • दिनमान साप्ताहिक में चरचे और चरखे नाम से चुटीली शैली का गद्य लेखन ।
  • दिनमान तथा अन्य पत्र-पत्रिकाओं में साहित्य, नृत्य, रंगमंच, संस्कृति आदि के विभिन्न विषयों पर टिप्पणियां तथा समीक्षात्मक लेख।
  • सर्वेश्वर की संपूर्ण गद्य रचनाओं को चार खण्डों में किताबघर दिल्ली ने छापा है।

मानवीय करुणा की दिव्य चमक/Manviya Karuna Ki Divya Chamak

 पाठ का सार

“मानवीय करुणा की दिव्य चमक” पाठ के लेखक सर्वेश्वर दयाल सक्सेना हैं।  इस पाठ में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना  ने  यूरोप के  बेल्जियम  नामक स्थान  में जन्मे ‘फादर कामिल बुल्के’ के व्यक्तित्व  और  जीवन का बहुत ही सुंदर वर्णन किया है। फादर कामिल बुल्के  एक ईसाई  धर्म के संत थे लेकिन वो आम  साधु – सन्यासियों जैसे नहीं थे।  उनका व्यक्तित्व एवं जीवन शैली आम साधु-संतों से बिल्कुल  अलग  थी |

भारत को अपना देश व अपने को भारतीय कहने वाले फादर कामिल बुल्के का जन्म बेल्जियम (यूरोप) के रैम्सचैपल शहर में हुआ था , यह शहर  गिरजों , पादरियों , धर्मगुरूओं और संतों की भूमि  के रूप में जाना जाता है । लेकिन  फादर कामिल बुल्के को भारत से बहुत अधिक प्रेम और लगाव था  इसलिए उन्होंने भारत को  अपने कर्म भूमि के रूप में  चलकर यहां रहते हुए  मानव समाज की सेवा  करने का संकल्प लिया ।

फादर कामिल बुल्के ने अपना बचपन और युवावस्था के  रैम्सचैपल में  ही बीते थे और उनके पिता एक व्यापारी थे । परिवार में उनके दो भाई और एक बहन  थी |  एक भाई पादरी था  जबकि दूसरा  भाई परिवार के साथ रहकर  अपने पिता के व्यापार में हाथ बटांता था। बहन  बहुत जिद्दी स्वभाव की थी और  उसकी  शादी काफी देर से हुई थी। परिवार संपन्न था और परिवार में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं थी l

फादर कामिल बुल्के  एक प्रतिभावान छात्र थे और उन्होंने इंजीनियरिंग में प्रवेश लिया था l  परंतु पढ़ते-पढ़ते उनका हृदय परिवर्तन हुआ और उन्होंने मानव समाज की सेवा के लिए  अपनी इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष की पढ़ाई  को छोड़ दिया और  विधिवत  रूप से संन्यास  ग्रहण कर लिया । उन्होंने संन्यास लेते वक्त  पादरी के सामने भारत जाने की अपनी इच्छा  रखी थी, जिसे मान लिया गया । फादर भारत  और भारत की संस्कृति से बहुत अधिक प्रभावित थे और यहां रहकर वह भारत की संस्कृति को करीब से देखना चाहते थे। भारत एक विशाल देश था और यहां बहुत सारे लोग ऐसे थे जिन्हें सहायता एवं सेवा की आवश्यकता थी, इसीलिए  कामिल बुल्के ने पादरी बनते वक्त  भारत में अपनी सेवाएं देने की शर्त रखी थी।

सन्यास ग्रहण करने के बाद फादर कामिल बुल्के भारत में आए  और यहीं के होकर रह गए l फादर बुल्के अपनी मां  से  बहुत प्यार करते थे। वह  हमेशा  उनको याद करते थे। उनकी मां  भी उन्हें बहुत प्रेम करती थी  और अक्सर उन्हें पत्र लिखती रहती थी , जिसके  विषय  में वह अपने दोस्त डॉ. रघुवंश को बताते थे। भारत में आकर उन्होंने “जिसेट संघ” में दो साल तक पादरियों के बीच रहकर धर्माचार की पढाई की।

इसके बाद कामिल बुल्के  ने  9 -10 वर्ष दार्जिलिंग में रहकर पढाई की।  फिर  उन्होंने कोलकाता से बी.ए और इलाहाबाद से हिंदी में एम.ए की डिग्री हासिल की और इसी के साथ ही उन्होंने प्रयाग विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग से सन 1950 में “रामकथा : उत्पत्ति और विकास” विषय में शोध भी किया। इस प्रकार फादर कामिल बुल्के नहीं एक संत होते हुए भी अपने अध्ययन कार्य को अनवरत जारी रखा | फादर बुल्के ने मातरलिंक के प्रसिद्ध नाटक “ब्लू बर्ड” का हिंदी में नील पंछी के नाम से अनुवाद किया।

बाद में उन्होंने सेंट जेवियर्स कॉलेज , रांची में हिंदी और संस्कृत विभाग के विभागाध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया। यही उन्होंने अपना प्रसिद्ध “अंग्रेजी -हिंदी शब्दकोश” भी तैयार किया और बाइबिल का भी हिंदी में अनुवाद किया। उनका हिंदी के प्रति अथाह प्रेम  और लगाओ इन्हीं  सारे कार्यों से प्रकट होता है |  वे हिंदी को बहुत पसंद करते थे यही कारण था कि एक विदेशी मूल के नागरिक होने के बावजूद उन्होंने हिंदी में अध्ययन एवं अध्यापन के कार्य को जारी रखा |

जहरबाद बीमारी के कारण उनका 73 वर्ष की उम्र में देहांत हो गया। फादर  कामिल  बुल्के भारत में लगभग 47 वर्षों तक रहे।  इस  दौरान वे  सिर्फ तीन या चार बार ही अपनी मातृभूमि बेल्जियम गए। इस प्रकार उन्होंने भारत को  तन मन से अपना राष्ट्र मान लिया था l

लेखक और फादर कामिल बुल्के के मध्य घनिष्ठ पारिवारिक संबंध थे l लेखक उनसे बहुत प्रभावित थे l लेखक का फादर कामिल बुल्के से ही प्रथम परिचय इलाहाबाद में हुआ था और इसके बाद जीवन भर में उनके संपर्क में रहे l

लेखक के अनुसार फादर वात्सल्य व प्यार की साक्षात  प्रतिमूर्ति थे। वह हमेशा लोगों को अपने  प्रेम और आशीर्वाद से भर देते थे। उनके दिल में हर किसी के लिए प्रेम ,  करुणा व अपनत्व  की भावना थी । वह लोगों के दुख में शामिल होते और उन्हें अपने  प्यार भरे शब्दों से सांत्वना  देकर उनके मन को शांत कर देते थे। वो जिस  किसी व्यक्ति से एक बार रिश्ता बनाते थे , उसे जीवन  भर निभाते थे  और उसके हर सुख – दुख में शामिल होते थे l

फादर कामिल बुल्के हिंदी को राष्ट्रभाषा के पद पर प्रतिष्ठित होते देखना चाहते थे  परंतु उन्हें इस बात से बहुत दुख होता था कि हिंदी भाषी ही हिंदी की उपेक्षा करते हैं l वह हमेशा हिंदी के उत्थान के लिए कार्यरत रहते थे l

लेखक को फादर कामिल बुल्के की बीमारी का पता नहीं चल पाया था l इस कारण से वह फादर कामिल बुल्के के अंतिम दर्शन भी नहीं कर पाए थे जिस बात का उन्हें बहुत अफसोस रहा है l

18 अगस्त 1982 की सुबह 10 बजे कश्मीरी गेट के निकलसन कब्रगाह में उनका ताबूत एक छोटी सी नीली गाड़ी में से कुछ पादरियों , रघुवंशीजी के बेटे  , राजेश्वर सिंह द्वारा उतारा गया ।फिर उस ताबूत को पेड़ों की घनी छाँव वाली सड़क से कब्र तक ले जाया गया। उसके बाद फादर बुल्के के मृत शरीर को कब्र में उतार दिया।

रांची के फादर पास्कल तोयना ने मसीही विधि से उनका अंतिम संस्कार किया और  सबने नम आंखों से फादर बुल्के को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।उनके अंतिम संस्कार के वक्त वहां हजारों लोग इकट्ठे थे , जिन्होंने नम आंखों से फादर बुल्के को अपनी अंतिम श्रद्धांजलि दी। इसके अलावा वहाँ जैनेन्द्र कुमार , विजेंद्र स्नातक , अजीत कुमार , डॉ निर्मला जैन , मसीही समुदाय के लोग , पादरीगण , डॉक्टर सत्यप्रकाश और डॉक्टर रघुवंश भी उपस्थित थे।

लेखक कहते हैं कि फादर कामिल बुल्के ने जीवन भर अपने प्रेम , करुणा एवं दया से  सभी को अभिभूत कर दिया  l उनकी रग – रग में प्रेम की मिठास भरी थी l ऐसे व्यक्ति की मृत्यु जहरबाद से होना परमात्मा का अन्याय नहीं तो और क्या है l  लेखक ने फादर कामिल बुल्के की तुलना एक ऐसे फलदार एवं छायादार व्यक्ति की है , जो अपनी शरण में आए हुए लोगों  की थकान पीड़ा और भूख को मिटा  देते थे l

फादर बुल्के  हम सबके साथ रहते हुए , हम जैसे होकर भी , हम सब से बहुत अलग थे। प्राणी मात्र के लिए उनका प्रेम व वात्सल्य उनके व्यक्तित्व को मानवीय करुणा की दिव्य चमक (Manviya Karuna Ki Divya Chamak) से प्रकाशमान करता था।

NCERT solution of Manviya Karuna Ki Divya Dhamak/मानवीय करुणा की दिव्य चमक | कक्षा 10 |

प्रश्न/उत्तर

प्रश्न 1. फ़ादर की उपस्थिति देवदार की छाया जैसी क्यों लगती थी ?

उत्तर – देवदार के वृक्ष लंबे चौड़े एवं सघन होते हैं | उनकी शरण में आने वाले व्यक्ति को सूर्य की तपती धूप से राहत प्राप्त होती है और उनकी  सारी थकान दूर हो जाती है | फादर कामिल बुल्के का व्यक्तित्व भी कुछ इसी प्रकार का था| वे अपने पास आने वाले व्यक्ति के   ऊपर अपनी दया, करुणा एवं अपनत्व की भावना की वर्षा कर देते थे  तथा अपनी मीठी – मीठी एवं करुणा भरी बातों से दुखी और संतृप्त व्यक्ति को सांत्वना देकर उसका दुख हर लेते थे | लेखक भी जब कभी निराश और हताश होता था तब फादर कामिल बुल्के के पास जाकर उनकी सारी निराशा और हताशा दूर हो जाती थी  इसलिए उन्हें फादर कामिल बुल्के  की उपस्थिति देवदार के छायादार वृक्ष के समान प्रतीत होती थी l

प्रश्न 2. फ़ादर बुल्के भारतीय संस्कृति के एक अभिन्न अंग हैं। किस आधार पर ऐसा कहा गया है ?

उत्तर- फादर कामिल बुल्के भारतीय संस्कृति से बहुत अधिक प्रभावित थे|  उन्हें बचपन से ही भारतीय संस्कृति से लगाव था तथा भारतीय संस्कृति की ‘वसुधैव कुटुंबकम’ एवं ‘विश्व बंधुत्व की भावना’  ने उन्हें बहुत प्रभावित किया था| यही कारण था कि सन्यास ग्रहण करने के बाद उन्होंने भारत में आकर यहां रहना  आरंभ किया और यहीं के होकर रह गए|

 फादर कामिल बुल्के हिंदी हिंदुस्तान और हिंदुस्तानी संस्कृति से बहुत अधिक प्रेम करते थे | उन्होंने हिंदी  को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए पुरजोर प्रयास किया था। उन्होंने “ब्लू बर्ड” और “बाइबिल” का भी हिंदी में रूपांतरण कर हिंदी भाषा को समृद्ध करने का काम किया। साथ में उन्होंने प्रसिद्ध अंग्रेजी-हिंदी शब्दकोश भी तैयार किया था । इस प्रकार उन्होंने हिंदी के उत्थान के लिए अनेक कार्य किए |

प्रश्न 3. पाठ में आए उन प्रसंगों का उल्लेख कीजिए , जिनसे फ़ादर बुल्के का हिंदी प्रेम प्रकट होता है ?

उत्तर- फ़ादर बुल्के का हिंदी प्रेम प्रकट करने वाले  कुछ प्रसंग निम्नानुसार हैं –

  • फ़ादर  कामिल बुल्के ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए की डिग्री प्राप्त की।
  • इलाहाबाद में फ़ादर बुल्के “परिमल” नाम की एक हिंदी संस्था से भी जुड़े थे। वे अक्सर हिंदी भाषा व साहित्य से संबंधित गोष्ठियों और सभाओं में भी सम्मिलित होते थे।
  • फ़ादर बुल्के अन्य लेखकों की रचनाओं पर  स्पष्ट व बेबाक राय रखते थे। और जरूरत होने पर उन्हें सुझाव भी देते थे।
  •  फादर बुल्के ने ” रामकथा : उत्पत्ति और विकास” में शोध भी किया था।
  • उन्होंने “ब्लू बर्ड नामक नाटक का “नील पंछी”  नाम से और बाइबिल का हिंदी में अनुवाद भी तैयार किया था।
  • फादर  कामिल बुल्के  ने रांची के सेंट जेवियर्स कॉलेज में हिंदी तथा संस्कृत विभाग के विभागाध्यक्ष  के पद पर कार्य भी किया  था |
  • उन्होंने अंग्रेजी-हिंदी कोष भी बनाया था।

फादर बुल्के हमेशा ही हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में देखना चाहते थे और उन्हें इस बात से पीड़ा होती थी कि हिंदी भाषी लोग हिंदी की उपेक्षा कर रहे हैं |

प्रश्न 4. इस पाठ के आधार पर फ़ादर कामिल बुल्के की जो छवि उभरती है , उसे अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर- फादर कामिल बुल्के लंबे पतले गोरे  और सफेद बुरी दाढ़ी वाले व्यक्ति थे | जिनके चेहरे से ओज  व शांति टपकती थी l वह मानव मात्र के प्रति अपने हृदय में दया , करुणा और अपनत्व की भावना रखते थे l वे भारत और भारतीय संस्कृति से बहुत अधिक प्रभावित थे और उन्होंने भारत को पूरी तरीके से स्वीकार कर लिया था |  वे अपने पास आने वाले लोगों से बहुत ही प्रेम और अपनत्व से  मिलते थे तथा अपनी बातों से उनके दुख – दर्द को दूर कर देते थे | उनका साथ मिलने वालों के लिए  देवदार के छायादार वृक्ष की भांति होता था | फादर कामिल बुल्के हिंदी को बहुत अधिक तवज्जो देते थे और हिंदी उनकी मातृभाषा मेन होते हुए भी उन्होंने हिंदी में उच्च शिक्षा प्राप्त की  तथा हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के लिए भरपूर प्रयास किया l

प्रश्न 5. लेखक ने फ़ादर बुल्के को “मानवीय करुणा की दिव्य चमक” क्यों कहा है?

उत्तर- फादर कामिल बुल्के एक असाधारण संत थे  वे सभी के प्रति अपने हृदय में दया करुणा प्रेम अपनत्व एवं सहयोग की भावना रखते थे| सभी का हृदय से कल्याण चाहते थे| उनका पूरा व्यक्तित्व “मानवीय करुणा की दिव्य चमक” की आभा से आलोकित होता  रहता था।

लेखक के लिए उनको देखना करुणा के निर्मल जल में स्नान करने जैसा और उनसे बात करना कर्म के संकल्प से भरने जैसा था। और उनको याद करना एक उदास शांत संगीत को सुनने जैसा था। लेखक के अनुसार उनकी रगों में दूसरों के लिए मिठास भरे अमृत के अतिरिक्त और कुछ नहीं था। इस प्रकार लेखक को फादर कामिल बुल्के का संपूर्ण व्यक्तित्व  मानवीय करुणा की दिव्य चमक – सा प्रतीत होता था|

प्रश्न 6. फ़ादर बुल्के ने संन्यासी की परंपरागत छवि से अलग एक नई छवि प्रस्तुत की है , कैसे ?

उत्तर- जब कोई व्यक्ति सन्यास  सन्यास ग्रहण करता है, तो वह दुनियादारी से दूर हो जाता है और उसके लिए सारे रिश्ते – नाते और संबंध समाप्त हो जाते हैं| वह  सारे  सांसारिक बंधनों को त्याग कर किसी एकांत स्थान पर जाकर प्रभु की भक्ति में लीन हो जाता है|

परंतु फादर कामिल बुल्के  सावधान साधु-संतों  से अलग स्वभाव के थे| वे लोगों से रिश्ते बनाते थे और उन्हें पूरी तन्मयता से निभाते थे| लोगों के सुख – दुख में शामिल होते थे। लोगों से गहरा रिश्ता बनाते और फिर उसको पूरे दिल से निभाते थे। वे लोगों के पारिवारिक कार्यक्रमों में सम्मिलित होते या लोगों से मिलने उनके घर आते जाते रहते थे। वह हर किसी व्यक्ति को एक समान भाव से देखते और सब के प्रति प्रेम, आत्मीयता और करुणा का भाव रखते थे। फादर की यही वो बातें हैं जो उनको परंपरागत संन्यासी की छवि से हटकर अलग बनाती हैं।

प्रश्न 7. आशय स्पष्ट कीजिए

(क) नम आँखों को गिनना स्याही फैलाना है।

उत्तर- फादर कामिल बुल्के की मृत्यु पर  हजारों की संख्या में लोग उनके अंतिम दर्शनों के लिए उमड़े थे जिनमें ईसाई धर्मानुयायीयों के साथ अनेक साहित्यकार, उनके मित्र, हिंदी प्रेमी और अन्य लोग बड़ी संख्या में उपस्थित थे वहां उपस्थित सभी लोगों की आंखें नम थी और वे नम आँखों से  फादर को भावभीनि विदाई दे रहे थे।उस वक्त फ़ादर को नम आँखों से विदाई देने वालों की संख्या इतनी अधिक थी कि उनकी गिनती कर उनके नामों का उल्लेख करना स्याही बर्बाद करने जैसा ही  होता । यानि अनगिनत संख्या में लोग फादर कामिल बुल्के के अंतिम दर्शनों के लिए वहाँ उपस्थित थे ।

(ख) फ़ादर को याद करना एक उदास शांत संगीत को सुनने जैसा है।

उत्तर –“फ़ादर को याद करना एक उदास शांत संगीत को सुनने जैसा है”  इस कथन का आशय यह है कि जब हम कभी शांत मुद्रा में बैठकर धीमा-धीमा उदास शांत संगीत सुनते हैं, तो हमारा मन एक अजीब से दुख व करुणा से भर जाता है। और हमारी आंखें नम हो  उठती हैं| चारों और एक  खामोशी सेी छा जाती है|

ठीक ऐसा ही लेखक को तब महसूस होता है जब लेखक फादर  कामिल बुल्के को याद करते है।

प्रश्न 8. आपके विचार से बुल्के ने भारत आने का मन क्यों बनाया होगा?

उत्तर-  प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति एवं यहां का दर्शन  विदेशी ज्ञान पिपासुओं के लिए श्रद्धा शोध  एवं आकर्षण का केंद्र रहा है| प्राचीन भारतीय मनीषियों के अद्भुत ज्ञान , सांस्कृतिक मूल्यों  तथा गौरवशाली अतीत के कारण  फादर कामिल बुल्के का मन भारत की ओर आकर्षित हुआ  होगा  और शायद इसलिए ही उन्होंने भारत को अपनी कर्मभूमि के रूप में चुना|

प्रश्न 9. ‘बहुत सुंदर है मेरी जन्मभूमि-रैम्सचैपल।’-इस पंक्ति में फ़ादर बुल्के की अपनी जन्मभूमि के प्रति कौन-सी भावनाएँ अभिव्यक्त होती हैं ? आप अपनी जन्मभूमि के बारे में क्या सोचते हैं?

उत्तर- बहुत सुंदर है मेरी जन्मभूमि-रैम्सचैपल’ इस पंक्ति में फ़ादर बुल्के का अपनी मातृभूमि के प्रति असीम प्रेम का भाव प्रकट होता है।और वो भारत में रह कर भी अपनी जन्मभूमि – रैम्सचैपल को बहुत याद करते थे। और उसके लिए अपने दिल की गहराइयों से सम्मान व्यक्त करते थे।

मेरे अपनी जन्म भूमि के प्रति विचार –

मैं भी अपनी जन्मभूमि  से बहुत अधिक प्यार करता हूँ। क्योंकि इसी भूमि  पर  मैंने जन्म लिया। और इसी माटी से उपजे अन्न से  मेरा पालन-पोषण  हुआ है  और मैंने यही का पानी पीकर अपनी प्यास बुझाई है।  मेरी मातृभूमि का मुझ पर बहुत बड़ा कर्ज है  और मैं उस कर्ज को कभी नहीं चुका सकता| परंतु मैं अपनी मातृभूमि के प्रति सम्मान प्रेम एवं श्रद्धा की भावना रखकर  इस  कर्ज को  कुछ हद तक  चुका सकता हूं| मैं दुनिया में कहीं भी रहूं। लेकिन मैं हमेशा दिल से अपनी जन्मभूमि को याद करता करता रहूंगा। उसके प्रति सम्मान व्यक्त करता रहूंगा।

प्रश्न 10 . मेरा देश भारत विषय पर 200 शब्दों का निबंध लिखिए?

उत्तर –

मेरा देश भारत

मेरा देश भारत है और मुझे अपने देश पर अभिमान है| मेरा देश एक ऐसा देश है जो  आदि  काल से  संपूर्ण मानव प्रजाति को  राह दिखाता रहा है| भारत प्राचीन काल में विश्व गुरु कहलाता था क्योंकि यहां का ज्ञान – विज्ञान विश्व में अद्वितीय था| भारत  ने  विश्व समुदाय को अनेक आविष्कार दिए हैं| भारत में आज से लगभग 5000 वर्ष पूर्व गीता का उपदेश श्री कृष्ण के द्वारा अर्जुन को दिया गया, जो आज भी संपूर्ण विश्व को राह दिखलाता है| विश्व की सबसे प्रेरक और सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली  पुस्तक है ‘श्रीमद्भागवत गीता’  और इसकी रचना भारत भूमि पर ही हुई थी| भारत की भूमि महापुरुषों की भूमि रही है | यहां  महात्मा बुद्ध, महावीर स्वामी, मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम, लीला अवतार श्री कृष्ण  आदि महापुरुष हुए हैं , जिन्होंने भटकी हुई मानव सभ्यता को एक सही राह दिखलाने का कार्य किया | वहीं अनेक वैज्ञानिक भी हुए हैं , जिन्होंने अपने नए – नए आविष्कारों से मानव सभ्यता  को गौरवान्वित किया | भारत में ऐसे ऐसे राजा – महाराजा हुए हैं जिनकी दानवीरता ,  सौर्य  एवं  न्याय प्रणाली की मिसाल दुनिया देती है | भारत में ऐसे राष्ट्रभक्त हुए हैं , जिन्होंने देश  के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया |

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी भारत  ने सदैव विश्व समुदाय का नेतृत्व कर  मानवता की  अनुपम मिसाल कायम की है | भारत ज्ञान – विज्ञान,  व्यापार – व्यवसाय  तथा खेलकूद के क्षेत्र में  नित्य नवीन कीर्तिमान रचता जा रहा है | भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली विश्व की सबसे समृद्ध लोकतांत्रिक प्रणाली है | भारत में विभिन्न संस्कृतियों एवं विभिन्न धर्मावलंबियों  के मध्य  वैचारिक सामंजस्य एवं  एकता  अपने आप में अनुपम है | मुझे गर्व है कि मेरा जन्म भारत की पवित्र भूमि पर हुआ और मैं एक भारतीय हूं | मैं अपने देश और अपनी संस्कृति के  के प्रति गौरव का भाव रखता हूं  और अपने देश से बहुत अधिक प्रेम करता हूं |

प्रश्न – 11. आपका मित्र हडसन एंड्री ऑस्ट्रेलिया में रहता है। उसे इस बार की गर्मी की छुट्टियों के दौरान भारत के पर्वतीय क्षेत्र में भ्रमण हेतु निमंत्रण करते हुए पत्र लिखिए ?

उत्तर-

231 /4क ,  शिवाजी पार्क कॉलोनी

 बहरोड रोड, अलवर l

दिनांक : 12 जून 2018

 

प्रिय दोस्त हडसन एंड्री ,

                           सप्रेम नमस्ते !  लंबे समय बाद आपका पत्र मिला। समाचार प्राप्त कर बड़ी खुशी हुई। यहाँ पर भी  सभी  कुशल – मंगल  हैं। मेरी पढाई ठीक चल रही हैं। दोस्त यह  पत्र मैंने आपको इस कारण से लिखा है  कि अगले सप्ताह से मेरी गर्मियों की छुट्टियों प्रारंभ हो रही हैं। जो करीबन एक महीने तक चलेगी।और इन गर्मियों की छुट्टियों में मैने भारत के पर्वतीय क्षेत्रों में भ्रमण करने की योजना बनाई हैं।

एंड्री  मैं दिल से चाहता हूं  कि तुम भी मेरे साथ भारत के पर्वतीय क्षेत्रों में भ्रमण के लिए चलो ,, तुम्हारा साथ पाकर मुझे बहुत खुशी होगी और हम दोनों मिल कर बहुत आनंद  करेंगे  ।  इसीलिए मैं तुम्हें इस पत्र के माध्यम से भारत आने तथा अपने साथ भ्रमण के लिए चलने का आमंत्रण दे रहा हूं।  मित्र आप अपने परिवार को भी साथ लेकर के आना इसी बहाने मैं आपके परिवार से भी मिल पाऊंगा l   मेरे  माताजी – पिताजी भी आपसे और आपके परिवार से मिलने को बहुत आतुर है l  इसी बहाने तुम्हें भारत के रीति रिवाज , खान-पान , रहन- सहन और संस्कृति  को करीब से देखने का अवसर मिलेगा ।  मित्र आशा करता हूं कि तुम मेरा निमंत्रण स्वीकार करके भारत अवश्य आओगे ,  फिर हम दोनों साथ में खूब मौज मस्ती भी करेंगे। बहुत मजा आएगा।

मित्र आप की माता जी का पिता जी को मेरी तरफ से नमस्ते कहना  तथा एंजिला को   प्रेम देना l

आपके पत्र की प्रतीक्षा में …..

 

आपका अभिन्न मित्र

रोहन भारद्वाज

भाषा अध्ययन

12. निम्नलिखित वाक्यों में समुच्यबोध छाँटकर अलग लिखिए –

(क) तब भी जब वह इलाहाबाद में थे और तब भी जब वह दिल्ली आते थे।

उत्तर: और

(ख) माँ ने बचपन में ही घोषित कर दिया था कि लड़का हाथ से गया।

उत्तर: कि

(ग) वे रिश्ता बनाते थे तो तोड़ते नहीं थे।

उत्तर: तो

(घ) उनके मुख से सांत्वना के जादू भरे दो शब्द सुनना एक ऐसी रोशनी से भर देता था जो किसी गहरी तपस्या से जनमती है।

उत्तर: जो

(ङ्)  पिता और भाइयों के लिए बहुत लगाव मन में नहीं था लेकिन वो स्मृति में अकसर डूब जाते।

उत्तर: लेकिन

 

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