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Sana Sana Hath Jodi | साना साना हाथ जोड़ि | पाठ का सार | NCERT Solutions | लेखिका – मधु कांकरिया |

मधु कांकरिया का जीवन परिचय 

हिन्दी की सुप्रसिद्ध कवयित्री और लेखिका  मधु कांकरिया का जन्म एक निम्न मध्यवर्गीय जैन व्यवसायी परिवार में 23 मार्च, 1957  को  कोलकता में हुआ। उन्होंने कोलकता विश्वविद्यालय कोलकता से अर्थशास्त्र विषय  से  एम०ए० की उपाधि प्राप्त की  । उन्होंने कंप्यूटर एप्लीकेशन में डिप्लोमा भी किया। उन्होंने भारत के अनेक दर्शनीय स्थलों का भ्रमण किया  और वहां की सभ्यता , संस्कृति , सामाजिक मान्यताओं , धार्मिक मान्यताओं , प्राकृतिक सौंदर्य एवं भौगोलिक विशेषताओं का चित्रण बड़ी ही सुक्ष्मता  के साथ  अपने यात्रा – वृतांतो  मे किया है I  लेखिका जब कभी आधुनिक भाग – दौड़ भरी और मशीनें जिंदगी से ऊब जाती हैं , तब वे किसी रमणीक स्थान की यात्रा के लिए निकल पड़ती हैं और उस स्थान की विशेषताओं एवं मार्ग  मैं  देखे गए दृश्यों का एक सुंदर एवं सजीव  शब्द चित्र अपनी रचनाओं में प्रस्तुत करती है|

मधु कंकरिया की किताबें पढ़ने  मे रूचि बचपन से ही थी। पिताजी साहित्य प्रेमी थे , उन्हें किताबे, अखबार, पत्र-पत्रिकाएँ  आदि पढ़ने का बेहद शौक था। इसलिए घर पर चर्चित लेखकों की किताबें उपलब्ध रहती थी।  उनके घर पर  बचपन में मुंशी  प्रेमचंद, शरदचंद, , रविंद्र नाथ टैगोर , फणीश्वर नाथ रेणु, मन्नू भंडारी आदि प्रसिद्ध रचनाकारों की रचनाएं  मौजूद रहती थी और उनके साहित्य  को पढ़ते-पढ़ते लेखिका में साहित्यिक  रुचि का विकास होना आरंभ हो गया । कॉलेज के दिनों में  उन्होंने छोटी-छोटी कहानियाँ लिखना आरंभ किया।  और धीरे-धीरे साहित्य लेखन में महारत हासिल की  और धीरे-धीरे उनकी रचनाएं  उस समय की प्रसिद्ध पत्रिकाओं वागर्थ, हंस  आदि में छपने लगी |

मधु कांकरिया जी को घूमना – फिरना बहुत पसंद है।  वे आधुनिक जीवन की घुटन एवं ऊब को दूर करने का सबसे महत्वपूर्ण साधन भ्रमण  को मानती है और वह जहाँ जाती हैं वहाँ के जनजीवन, संस्कृति, समाज  आदि का चित्रण अपनी रचनाओं में करती है । मधु  काकरिया ने भारत के लगभग सभी राज्यों का  भ्रमण कर लिया है तथा उन्होंने अनेक विदेशी यात्राएं भी की है I  जिनमें  यूरोप के सात देश हॉलैंड, जर्मनी, प्राग, इटली, स्वीजरलैंड, फ्रांस की यात्राएं  शामिल  है।

प्रमुख रचनाएं –  उन्होंने साहित्य की अनेक विधाओं में लेखन कार्य किया है I उनकी प्रमुख रचनाएं निम्नानुसार है

कहानी संग्रह

  • बीतते हुए
  • और अन्त में ईसु
  • चिड़िया ऐसे मरती है
  • भरी दोपहरी के अँधेरे

उपन्यास

  • खुले गगन के लाल सितारे
  • सलाम आखिरी
  • पत्ता खोर
  • सेज पर संस्कृत
  • सूखते चिनार

सामाजिक विमर्श

  • अपनी धरती अपने लोग

टेली फिल्म लेखन

  • रहना नही देश विराना है

मधु कांकरिया की उपलब्धियाँ 

  • सन् 2008 में ‘‘कथा क्रम सम्मान” आनंद सागर स्मृति सम्मान से पुरस्कृत किया गया।
  • सन् 2009 में अखिल भारतीय मारवाड़ी युवा मंच द्वारा साहित्यिक व अन्य सामाजिक कार्यों मे योगदान हेतु ‘‘मारवाड़ी समाज गौरव पुरस्कार” से सम्मानित।
  • हेमचंद आचार्य साहित्य सम्मान” विचार मंच द्वारा सन् 2009 में सम्मानित ।
  • सन् 2012 में विजय वर्मा कण सम्मान से पुरस्कृत किया गया।

साना साना हाथ जोड़ि/Sana Sana Hath Jodi

यह लेखिका मधु कांकरिया के द्वारा लिखा गया एक यात्रा वृतांत है। इसमें उन्होंने अपनी सिक्किम की ख़ूबसूरत एवं रोमांचक यात्रा का वर्णन किया है।  सिक्किम के प्राकृतिक सौंदर्य ,  हिमालय की बर्फ से ढकी पर्वत चोटियों , पहाड़ों से गिरते ऊंचे – ऊंचे झरनों  और नदियों को देखकर लेखिका के मन में जो रोमांच  पैदा हुआ उसका वर्णन लेखिका ने इस यात्रा वृतांत में किया है I

पाठ का सार (Sana Sana Hath Jodi)

Sana Sana Hath Jodi : लेखिका ने अपनी यात्रा की इस कहानी का प्रारम्भ  उस समय से किया  है, जब वो गंगटोक पहुंची और  रात्रि में गंगटोक में आसमान के नीचे से असंख्य तारो को देखती है और देखती ही रह जाती है। तारों के उस दृश्य में उस पल लेखिका को तारों के साथ कुछ अलग सा महसूस होता है और वे उन जादुई क्षणों में सम्मोहन सा अनुभव करने लगती है और कुछ समय के लिए गुम हो जाती है। ऐसा अनुपम प्राकृतिक सौंदर्य लेखिका ने पहले कभी नहीं देखा था l इसलिए उनका मन रोमांच से भर उठता है|

लेखिका ने  गंगटोक शहर को ”मेहनतकश बादशाहो का शहर”  का शहर कहा है क्योंकि लेखिका जानती है कि इस शहर के लोग बहुत मेहनती है और वे अपना जीवन यापन  मेहनत करके ही करते है।

अगले दिन सुबह लेखिका एक प्रार्थना करने करने में मशगूल हो जाती है , जिसके बोल थे ”साना साना हाथ जोडि, गर्दहु प्रार्थना, हाम्रो जीवन तिम्रो कौसेली” इसका अर्थ होता है कि  हे ईश्वर  मैं अपने छोटे – छोटे हाथ जोड़कर प्रार्थना कर रही हूँ कि मेरा सारा जीवन अच्छाइयों को समर्पित हो” यह प्रार्थना लेखिका मधु जी ने एक नेपाली लड़की से सीखी थी। और यह प्रार्थना लेखिका के दिल को छू गई थी |

अपनी प्रार्थना समाप्त करने के बाद  लेखिका  यूमथांग तक पहुंचने से पहले  हिमालय की तीसरी सबसे ऊंची चोटी कंचनजंगा  को देखने के लिए  अपने होटल की बालकनी में पहुंचती है लेकिन  बादलों से गिरी होने के कारण वह कंचनजंगा चोटी को देखने में असफल रहती है । लेकिन सामने खिले हुए ढेर सारे फूलों को देखकर वे प्रसन्नचित हो जाती है।

खिले हुए फूलों को देखने के बाद प्रसन्न चित्त मन से लेखिका गंगटोक से 149 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यूमथांग की ओर चल पड़ती है। युमथांग का अर्थ है घाटियां ।  लेखिका आगे की यात्रा पर गाइड जितेन नार्गे  तथा साथी मणि के साथ निकलती है l तीन लोगों का यह समूह पाइन और धूपी के शानदार और नुकीले पेड़ों को निहारते हुए पहाड़ी रास्तों पर आगे की ओर  चल पड़ता है|

उन रास्तों पर आगे चलकर लेखिका को  बौद्ध धर्मावलंबियों द्वारा  क्रम से लगाई गई सफेद अहिंसा पता कहां दिखाई देती हैं l गाइड जितेन लेखिका को बताता है कि इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म का काफी प्रभाव है  और यह  पताकाएं बौद्ध धर्म की ही प्रतीक है l  इन पताकाओं पर कुछ मन्त्र लिखे हुए थे और यह पताका लहरा रही थी और शांति और  का सन्देश दे रही थी।

गाइड जितेन ने उन्हें बताया कि बुद्धिस्ट की मृत्यु के पश्चात् उनकी आत्मा को शांति मिले, इसीलिए शहर से बाहर कोई पवित्र जगह खोजकर वहां 108 पताका फहराई जाती है। साथ ही नार्गे ने यह भी बताया कि किसी शुभ अवसर पर सफेद की जगह रंगीन पताका लगा दी जाती है।

वही स्थित थोड़ी दूर “कवी लोंग स्टॉक” नामक जगह के बारे में बताते हुए नार्गे कहते है कि यहां मशहूर फिल्म गाइड का निर्माण हुआ था। इसी स्थान पर आगे लेखिका जब एक कुटिया के अंदर पहुंची  जहां  “प्रेयर व्हील यानि धर्म चक्र” को घूमते हुए देखकर  उन्होंने इस चक्र के बारे में जानना चाहा। तब नार्गे ने उनकी जिज्ञासा शांत करते हुए उन्हें जानकारी दी कि यह प्रेयर व्हील यानी धर्म चक्र है। ऐसी मान्यता है कि इसको घुमाने से सभी पापों का नाश होता है। यह सुनकर लेखिका थोड़ी आश्चर्यचकित हुई और मन ही मन सोचा कि पहाड़ और मैदान से कोई फर्क नहीं पड़ता इस देश की आत्मा तो सदैव से एक है और सभी जगह एक जैसे अंधविश्वास एवं मान्यताएं देखने को मिल जाती हैं l

ऊंचे ऊंचे पहाड़ों पर चढ़ते हुए लेखिका को पीछे छूटने वाले  स्थानीय लोग, बाजार, बस्तियां सब ऐसे लग रहे थे जैसे उससे दूर होते जा रहे हो l लेखिका को नीचे की ओर देखने पर जो पेड़ पौधों से बने छोटे-छोटे घर थे, वे ताश के पत्तों के घर जैसे लगने लगे थे।

बहुत से तीर्थयात्रियों , कवियों , दर्शकों एवं साधु – संतो  का आराध्य कहा जाने वाला हिमालय का वैभवशाली स्वरूप धीरे-धीरे करके लेखिका के  सामने  आने लगा,  लेखिका को ऐसा लग रहा था जैसे हिमालय हर पल अपना रूप बदल रहा है । अब सुंदर प्राकृतिक दृश्य , आसमान से बातें करने वाले  ऊंचे – ऊंचे  पर्वत के शिखर और उन्हीं ऊंचाइयों से झर – झर गिरते जलप्रपात और नीचे की ओर पूरे तेजी से बहती हुई चांदी के सामान चमकती तीस्ता नदी को देखकर लेखिका बहुत ही रोमांच और आनंद की अनुभूति हो रही थी  ।

तभी उनकी गाड़ी “सेवन सिस्टर्स वाल्टरफॉल” पर ठहर गई। इस स्थान पर पहुंच कर लेखिका ने अपने अंदर एक बदलाव सा महसूस किया l उन्हें उस शांत वातावरण में झरने के शोर में कुछ ऐसा महसूस होने लगा जैसे कि उनके अंदर की सारी कमियां , बुराइयां  और मन के अवसाद इस झरने की निर्मल धारा के साथ  बहते जा रहे हों । यह दृश्य लेखिका के लिए अत्यंत शांति प्रदान करने वाला दृश्य था। उन्हें आज अनुभव हो रहा था कि क्यों प्राचीन काल में साधु-संत इस प्रकार के  प्राकृतिक परिवेश में आकर तपस्या किया करते थे |

लेखिका का सफर जैसे-जैसे आगे बढ़ता गया प्रकृति के दृश्य भी उसी जादुई रूप से बदलते गए, पर्वत , झरने  , घाटिय़ां , वादियां यह  सब  दुर्लभ नजारे  थे  l वहां का   हर एक दृश्य अपने आप में बेहद सुंदर था। अभी लेखिका यह सब देख ही रही थी कि उनकी नजर थिंक “ग्रीन बोर्ड” पर चली गई उन्हें ऐसा लगा कि यह सब कुछ उनकी कल्पनाओं से भी कहीं ज्यादा खूबसूरत है।

लेखिका को ऐसा लग रहा था जैसे ही वह किसी स्वप्न लोक में विचरण कर रही हो |

तभी लेखिका का काल्पनिक भ्रम अचानक   कुछ महिलाओं को देखकर टूट गया  और उन्हें एहसास हुआ कि जीवन की  जमीनी हकीकत यहां भी वही है , जो मैदानी इलाकों में थी l  वे महिलाएं अपना जीवन यापन करने के लिए कठोर परिश्रम कर रही थी l लेखिका देखती है कि कुछ पहाड़ी औरतें कुदाल और हथौड़ी से पत्थर तोड़ रही हैं, उनमें से कुछ महिलाओं ने अपनी पीठ पर बड़ी-बड़ी टोकरिया (डोको) बांध रखी है और साथ में उसी डोको में उनके बच्चे बंधे हुए हैं।

मातृ भावना और उसके श्रम का यह कठिन स्वरूप देखकर लेखिका के अंदर का हृदय पसीज गया। लेखिका ने उन महिलाओं के बारे में और जानने का प्रयास किया, पूछने पर पता चला कि यह महिलाएं पहाड़ी रास्तों के नव निर्माण के कार्यों में लगी हुई है। पहाड़ी रास्ते चौड़े हो जाएंगे तो आने जाने वालों के लिए खतरा कम हो जाएगा। लेकिन यह बड़ा ही खतरनाक कार्य है। क्योंकि इस कार्य में सड़कों को चौड़ी करने के लिए डायनामाइट का प्रयोग किया जाता है और इससे कई बार मजदूरों की जान भी जा चुकी है।  कई बार काम करने वाली श्रमिक महिलाएं थोड़ी सी असावधानी के कारण अपना संतुलन खो बैठती हैं और हजारों फुट गहरी खाई में जा गिरती हैं I  यह बात सुनकर लेकर का का हृदय अवसाद से भर उठता है|

यह सब कुछ देखकर लेखिका मन में सोचने लगी कि यह लोग समाज के लिए कितना कुछ कर रहे हैं और बदले में इन्हें बहुत थोड़ा सा मिल पाता है और आगे बढ़ने पर लेखिका ने देखा कि स्कूल से वापस आते हुए बच्चे जिनकी उम्र अभी 7 से 8 साल है, वह उनसे लिफ्ट मांग रहे थे।

लेखिका ने जब उन बच्चों से उनके स्कूल के बारे में पूछा  तब गाइड जितेन ने बताया कि  पहाड़ी इलाकों में स्कूल दूर – दूर होते हैं I यह छोटे-छोटे बच्चे रोज 3 से 4 किलोमीटर टेढ़े – मेढ़े पहाड़ी रास्तों पर पैदल ही चलते हैं , तब जाकर इन्हें किसी तरह अपना स्कूल मिलता है। शाम को यह घर वापस आकर अपनी माता के साथ मवेशियों को लेकर जंगल जाते हैं और वापस आते समय जंगल से लकड़ियों के गट्ठर सिर पर लादते हुए ही वापस आते हैं।

लेखिका की गाड़ी अब धीरे-धीरे पहाड़ी रास्तों से बढ़ने लगी थी तभी सूरज के अस्त होने का समय आ गया। यहां वह देखती हैं कि कुछ पहाड़ी महिलाएं मवेशियों को चरा कर अपने अपने घरों की ओर वापस आ रही थी। लेखिका की जीप अब चाय के बागानों से गुजरने लगी थी, सिक्किम के पारंपरिक परिधानों को पहने हुए कुछ लड़कियां बागानों से चाय की पत्तियां तोड़ कर अलग कर रही थी। चारों तरफ हरियाली के बीच लाल सूरज को डूबते हुए देखना पर ऐसा प्रतीत हो रहा था कि आकाश में इंद्रधनुष की छटा बिखर गई हो।

यूमथांग जाने से पहले लेखिका  का मन कुछ समय लायुंग में बिताने का था । लायुंग वह स्थान था जो इन गगनचुंबी पहाड़ियों के निचले हिस्से में सबसे शांत  स्थान था। वह जगह दौड़-भाग की जिंदगी से बिल्कुल विपरीत बिल्कुल शांत और एकांत जगह पर थी। यात्रा की थकान उतारने के लिए लेखिका तीस्ता नदी के किनारे एक बड़े पत्थर के ऊपर जाकर बैठ गई। और उसके ठंडे जल में अपने पैर डालकर अपनी थकान दूर करने लगी|

सूरज ढलने पर लेखिका ने स्थानीय लोगों और अपने साथियों  नाचने गाने का आनंद लिया I लायुंग के निवासियों की आजीविका के प्रमुख स्रोत है पहाड़ी आलू, धान की खेती और शराब।।

लेखिका का मन बर्फबारी देखने का था  परंतु उन्हें  स्थानीय व्यक्ति से जानकारी मिली कि  पर्यटको के आने के कारण  यहां अत्यधिक प्रदूषण होता है, इसीलिए बर्फबारी कम होती है। लेकिन यदि वह बर्फ देखना चाहती है तो उन्हें “कटाओ यानी भारत का स्विट्जरलैंड” जाना होगा।

अभी कटाओं की स्थिति पर्यटन स्थल के लिए इतने विकसित नहीं है इसलिए वहां पर्यटक बहुत कम पहुंच पाते हैं । यही कारण है कि  यह स्थान प्रदूषण से मुक्त है और यहां का प्राकृतिक सौंदर्य पहले के जैसा ही है । लायुंग से कटाओ का सफर समय करीब करीब 2 घंटे का था। लेकिन वहां पहुंचने के रास्ते टेढ़े मेढ़े थे जो कि काफ़ी खतरनाक साबित हो सकते थे।

कटाओ के पहाड़ बर्फ से ढके थे जिन की चमक चांदी जैसी थी लेखिका इसे देखकर बहुत प्रसन्न हो गई। वैसे तो वहां पर पर्यटक बस के साथ फोटो खिंचवाने में मग्न थे लेकिन लेखिका इस खूबसूरत दृश्य को अपनी आंखों में भर लेना चाहती थी। उन्हें वहां ऐसा महसूस हुआ जैसे ऋषि-मुनियों को वेद लिखने की प्रेरणा कटाओ से ही मिली हो लेखिका का ऐसा मानना था कि यदि प्रकृति के इस असीम सौंदर्य को कोई दुष्ट व्यक्ति भी नजर भर कर देख ले तो वह अध्यात्मिक हो जाएगा।

लेखिका की साथी मणि  के  मन  मे दार्शनिकता के भाव उत्पन्न होने लगे, वह  सोच रही थी कि प्रकृति ने क्या शानदार जल संचय की व्यवस्था की है, यह ढंग बहुत ही अनोखा है। पूरे एशिया के लिए यह हिमशिखर जल स्तंभ के रूप में वरदान है। ग्रीष्म ऋतु के आते ही यह बर्फ पिघल कर पानी का रूप ले लेती हैं और नदियों के द्वारा बहकर हम तक पहुंचते हैं तथा हमारी प्यास बुझती है।

इसी रास्ते पर आगे लेखिका ने कुछ फौजी छावनिय़ां देखी । तभी उन्हें याद आया कि य़ह बॉर्डर एरिया है,  और यहां से भारत और चीन की सीमा बनती है , उन्होंने एक फौजी से प्रश्न किया कि “आप इतनी कड़कड़ाती सर्दी में यहां कैसे रह लेते हैं” लेखिका की बात सुनकर फौजी हंसने लगे और कहने लगे कि देश के निवासी चैन से सोते हैं क्योंकि हम यहां पहरा देते हैं।

 उस फौजी की बात सुनकर लेखिका  मन  ही मन   सोचने लगी कि इतनी सर्दी में हम थोड़ी देर भी ठहर नहीं पा रहे और यह फौजी तो दिन – रात यही रहते है । लेखिका  उनकी देशभक्ति एवं कर्तव्य निष्ठा को देखकर   उनके सम्मान में झुक गई।

उन्होंने फौजियों से कहा “फेरी भेटुला यानी फिर मिलेंगे” और उनसे विदा ली।

रास्ते में  लेखिका ने एक चिप्स बेचती हुई युवती से  पूछा “क्या तुम सिक्किमी हो” युवती ने उसके उत्तर में कहा, “नहीं! मैं तो इंडियन हूं”। उसका जवाब सुनकर उन्हें बहुत प्रसन्नता हुई l सिक्किम पहले भारत के हिस्से में नहीं आता था, वह एक स्वतंत्र रजवाड़ा था लेकिन अभी सिक्किम भारत से इस तरह जुड़ गया है कि ऐसा प्रतीत नहीं होता है कि सिक्किम कभी भारत से अलग हुआ करता था। लेकिन अब सिक्किमी भारतीय बनकर काफी खुश हैं।

कुछ दूर आगे जाने पर एक पहाड़ी कुत्ता गाड़ी के सामने से  निकला , मणि ने  लेखिका को बताया कि  पहाड़ी कुत्तों के भौंकने की आवाज केवल चांदनी रात में ही सुनाई देती है। मणि बातें सुनकर लेखिका अचंभित हो गई। थोड़ा और आगे बढ़ने पर नार्गे ने गुरु नानक जी के फुटप्रिंट का पत्थर लेखिका को दिखाया।

नार्गे कहते हैं कि ऐसी मान्यता है कि यह वही स्थान है, जहां पर गुरु नानक जी के चावल की प्लेट से कुछ चावल के कुछ दाने जमीन पर गिर गए थे और जिस जिस स्थान पर वह चावल गिरे अब वही स्थान चावल की खेती का रूप ले चुका है।

लेखिका की गाड़ी आगे चलकर खेदुम में पहुंची यह लगभग  एक किलोमीटर तक फैला हुआ स्थान था। नार्गे बताते है कि स्थानीय लोग इसे देवी-देवताओं का निवास स्थान मानते हैं इसीलिए यहां कोई गंदगी नहीं होती , साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि यहां के लोग पहाड़ों , नदियों और झरनों की भी पूजा किया करते हैं, इसलिए वह इन्हें कभी गंदा कर ही नहीं सकते।

यह जानकर  लेखिका के मुंह से निकला  कि इसीलिए यह “गंगटोक शहर इतना खूबसूरत है।” लेकिन तभी गाइड नार्गे ने लेखिका को टोकते हुए कहा, मैडम गंगटोक नही गंतोक होता है, जिसका शाब्दिक अर्थ पहाड़ है इसीलिए गंतोक कहिए।

आगे नोर्गे ने लेखिका को बताया कि सिक्किम भारत से जुड़ा, उसके कई वर्षों पश्चात इंडियन आर्मी के एक ऑफिसर कैप्टन शेखर दत्ता ने निर्णय लिया की इस स्थान को पर्यटन स्थल बना दिया जाना चाहिए। इन निर्णय के बाद से ही सिक्किम में पहाड़ों को काटा जा रहा है और रास्ते तैयार किए जा रहे हैं तथा नए-नए पर्यटन स्थलों की भी खोज की जा रही हैं। मन ही मन मधु कांकरिया जी ने सोचा कि मनुष्य की कभी खत्म न होने वाले वाली इसी खोज का नाम सौंदर्य रखा गया है। इस प्रकार सिक्किम की यह यात्रा  लेखिका के लिए  प्राकृतिक सौंदर्य के दर्शन के साथ-साथ  पहाड़ी जीवन के नूतन अनुभव एवं रोमांच से भरी हुई है |

NCERT Solutions for Class 10 | Hindi A |Kritika | Chapter 3 | साना-साना हाथ जोड़ि |

पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास

प्रश्न 1. झिलमिलाते सितारों की रोशनी में नहाया गंतोक लेखिका को किस तरह सम्मोहित कर रहा था?

उत्तर- झिलमिलाते सितारों की रोशनी में नहाया गंतोक शहर लेखिका के मन में  एक सम्मोहन जगा रहा था। इस सुंदरता ने उस पर ऐसा जादू-सा कर दिया था कि उसे सब कुछ ठहरा हुआ-सा और अर्थहीन-सा लग रहा था। उसके भीतर-बाहर जैसे एक शून्य-सा व्याप्त हो गया था। झिलमिलाते सितारों की रोशनी में नहाए गंतोक शहर का प्राकृतिक सौंदर्य  लेखिका के लिए अनुपम  और अतुलनीय था |

प्रश्न 2. गंतोक को ‘मेहनकश बादशाहों का शहर’ क्यों कहा गया?

उत्तर- गंतोक पर्वतीय क्षेत्र में स्थित एक ऐसा स्थान है , जहां जीवनयापन सुगम नहीं है | यहां के लोगों को अपने दिन – प्रतिदिन की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कठोर परिश्रम करना पड़ता है | यहां के लोग बहुत मेहनती हैं और उन्होंने अपने परिश्रम से गंतोक शहर को एक सुंदर पर्यटन स्थल में बदल दिया है | गंतोक के निवासियों की  इसी श्रमजीवी प्रवृत्ति के कारण  लेखिका ने किस शहर को ‘मेहनकश बादशाहों का शहर’ कहा है |

प्रश्न 3. कभी श्वेत तो कभी रंगीन पताकाओं का फहराना किन अलग-अलग अवसरों की ओर संकेत करता है?

उत्तर- श्वेत पताकाएँ किसी बुद्धिस्ट की मृत्यु  होने पर  उनके सम्मान में फहराई जाती हैं। किसी बुद्धिस्ट की मृत्यु हो जाए तो उसकी आत्मा की शांति के लिए नगर से बाहर किसी वीरान स्थान पर मंत्र लिखी एक सौ आठ पताकाएँ फहराई जाती हैं, जिन्हें उतारा नहीं जाता। वे धीरे-धीरे अपने-आप नष्ट हो जाती हैं। रंगीन पताकाएँ किसी शुभ एवं मांगलिक कार्य के संपन्न होने पर फहराई जाती है I

प्रश्न 4. जितेन नार्गे ने लेखिका को सिक्किम की प्रकृति, वहाँ की भौगोलिक स्थिति एवं जनजीवन के बारे में क्या महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ दीं, लिखिए।

उत्तर- जितेन एक गाइड था , जो लेखिका को सिक्किम का भ्रमण करवा रहा था | उसने  लेखिका को सिक्किम की प्राकृतिक , भौगोलिक एवं ऐतिहासिक विशेषताओं के बारे में अनेक जानकारियां प्रदान की | उसके द्वारा दी गई जानकारियां निम्नानुसार है –

*सिक्किम में गंतोक से लेकर यूमथांग तक तरह-तरह के फूल हैं। फूलों से लदी वादियाँ हैं।

* निर्जन स्थान पर  पंक्तिबध रूप में लगाई गई शांत और अहिंसा के मंत्र लिखी ये श्वेत पताकाएँ जब यहाँ किसी बुद्ध के अनुयायी की मौत होती है तो लगाई जाती हैं। ये 108 होती हैं।

*रंगीन पताकाएँ किस नए कार्य और मांगलिक कार्य के  के शुरू होने पर लगाई जाती हैं।

*कवी-लोंग-स्टॉक-  नामक स्थान पर ‘गाइड’ फिल्म की शूटिंग हुई थी।

* एक झोपड़ी में घूमते हुए धर्म चक्र के विषय में बताया कि यह धर्मचक्र है अर्थात् प्रेअर व्हील। इसको घुमाने से सारे पाप धुल जाते हैं।

* पहाड़ी लोगों की शारीरिक विशेषताओं के बारे में अनेक जानकारियां लेखिका  को दी|

* ‘कटाओ’ की प्राकृतिक सुंदरता  के बारे में बताते हुए कहा कि इससे ‘हिंदुस्तान का स्विट्जरलैंड ‘ कहा जाता है|

*यूमथांग की घाटियों के बारे में बताया कि  यह घाटी कुछ दिनों के बाद ही फूलों से भर जाएगी और ऐसा लगने लगेगा जैसे फूलों की सेज सजी हो |

प्रश्न 5. लोंग स्टॉक में घूमते हुए चक्र को देखकर लेखिका को पूरे भारत की आत्मा एक-सी क्यों दिखाई दी?

उत्तर- लोंग स्टॉक में घूमते हुए चक्र को देखकर लेखिका ने उसके बारे में पूछा तो पता चला कि यह धर्म-चक्र है। इसे घुमाने पर सारे पाप धुल जाते हैं। जितेन की यह बात सुनकर लेखिका को  महसूस हुआ कि पूरे भारत की आत्मा एक ही जैसी है I भारत में मैदानी इलाकों, पहाड़ी इलाकों या फिर मरुस्थलीय इलाकों में कहीं भी चले जाएं, इस प्रकार की धार्मिक मान्यताएं एवं आस्थाएं हमें हर जगह देखने को मिल जाती है | कहीं पर किसी नदी को, कहीं पर किसी पर्वत को , कहीं पर किसी मंदिर को या कहीं पर किसी वृक्ष को ही मनुष्य के पापों एवं परेशानियों का अंत करने वाला माना जाता है| इस प्रकार संपूर्ण भारत में एक जैसी विचारधारा हमें देखने को मिल जाती है|

प्रश्न 6. जितने नार्गे की गाइड की भूमिका के बारे में विचार करते हुए लिखिए कि एक कुशल गाइड में क्या गुण होते हैं?

उत्तर- जितेन नार्गे लेखिका का गाइड था। उसे नेपाल और सिक्किम के बारे में काफी  जानकारी थी और  उसने भी सभी गुण थे जो एक अच्छे गाइड में होने चाहिए | एक कुशल गाइड में निम्नलिखित गुण होने चाहिए – 

* गाइड को अपने कार्य क्षेत्र की सामाजिक,  ऐतिहासिक, आर्थिक, भौगोलिक  एवं  धार्मिक विशेषताओं के विषय में पता होना चाहिए |

 * गाइड को हंसमुख व्यक्तित्व वाला होना चाहिए |

* एक अच्छा गाइड का होता है जो अपने पर्यटन क्षेत्र से जुड़ी हर छोटी-बड़ी बात को जानता है |

*  एक अच्छे गाइड में वाकपटुता का गुण होना चाहिए |

प्रश्न 7. इस यात्रा-वृत्तांत में लेखिका ने हिमालय के जिन-जिन रूपों का चित्र खींचा है, उन्हें अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर- अपने एक यात्रा वृतांत में लेखिका ने  हिमालय की हरी-भरी वादियों,  फूलों से सजी घाटियों , तथा बर्फ से ढकी चोटियों का बहुत ही मनोहारी वर्णन किया है |  लेखिका ने हिमालय से गिरते जलप्रपातो , आड़े – तिरछे  प्रवाह क्षेत्र से बहती तीस्ता नदी  और  मन को शांति प्रदान करने वाले प्राकृतिक दृश्यों का सुंदर वर्णन किया है | लेखिका के अनुसार हिमालय का नैसर्गिक सौंदर्य  व्यक्ति के जीवन की थकान , हताशा और निराशा को शांत कर उसे आध्यात्म और आत्मिक सुख की ओर ले जाता है | जीवन की भाग – दौड़ और आपा – धापी से दूर यह  सौंदर्य मनुष्य को सच्चे सुख की अनुभूति करवाता  है l

प्रश्न 8. प्रकृति के उस अनंत और विराट स्वरूप को देखकर लेखिका को कैसी अनुभूति होती है?

उत्तर- प्रकृति के उस अनंत और विराट स्वरूप को देखकर  लेखिका अध्यात्म की ओर उन्मुख होने लगती है | उसका मन शांत होने लगता है और  उसे  जीवन के यथार्थ का बोध होने लगता है |

उसे आदिम युग की अभिशप्त राजकुमारी-सी नीचे बिखरे भारी-भरकम पत्थरों पर झरने के संगीत के साथ आत्मा का संगीत सुनने जैसा आभास हो रहीं था। ऐसा प्रतीत हुआ जैसे देश और काल की सरहदों से दूर बहती धारा बन बहने लगी हो। भीतर की सारी तामसिकताएँ और दुष्ट वासनाएँ इस निर्मल धारा में बह गई हों।  उसे ऐसा लगने लगता है जैसे उसका मन निर्मल और शांत हो गया है  और जीवन का वास्तविक सत्य धीरे-धीरे उनकी समझ में आने लगा  है l

9. प्राकृतिक सौंदर्य के अलौकिक आनंद में डूबी लेखिका को कौन-कौन से दृश्य झकझोर गए?

उत्तर- प्राकृतिक सौंदर्य के अलौकिक आनंद में डूबी लेखिका को सड़क बनाने के लिए पत्थर तोड़ती, सुंदर कोमलांगी पहाड़ी औरतों  ने झकझोर कर रख दिया ।  लेखिका को उस पल एहसास हुआ कि प्रकृति के सुंदर नजारों के बीच भी  जीवन का संघर्ष यथावत बना हुआ है और इन सुंदर और हरी-भरी वादियों में भी व्यक्ति को जीवन – यापन के लिए कठोर संघर्ष और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है l  काम करती औरतों और उनकी पीठ पर ढोंगी में बैठे बच्चों को देखकर  लेखिका का मन अवसाद से भर उठा l वह सोचने लगी कि क्या कुछ ऐसा नहीं हो सकता है  कि जीवन का यह संघर्ष ठहर जाए और व्यक्ति अपने जीवन का समुचित आनंद उठा सके l

प्रश्न 10. सैलानियों को प्रकृति की अलौकिक छटा का अनुभव करवाने में किन-किन लोगों का योगदान होता है, उल्लेख करें।

उत्तर- सैलानियों को प्रकृति की अलौकिक छटा का अनुभव कराने में पर्यटकों के लिए उपलब्ध गाइड , स्थानीय लोगों  , साथी यात्रियों  तथा पर्यटन क्षेत्र की व्यवस्था  को बनाए रखने के लिए नियुक्त सरकारी कर्मचारियों आदि का योगदान सराहनीय होता है |

प्रश्न 11. “कितना कम लेकर ये समाज को कितना अधिक वापस लौटा देती हैं।” इस कथन के आधार पर स्पष्ट करें कि आम जनता की देश की आर्थिक प्रगति में क्या भूमिका है?

उत्तर- आम जनता को सुख सुविधाएं प्रदान करने मे देश के श्रमिक वर्ग का योगदान सबसे महत्वपूर्ण होता है l यह वह वर्ग होता है , जो स्वयं सुविधाओं से वंचित रह कर भी  निरंतर परिश्रम करते हुए  समाज को सुख – सुविधाएं प्रदान करता है l समाज की भौतिक एवं आर्थिक उन्नति में इस वर्ग का योगदान अति महत्वपूर्ण होता है l किसी देश की आर्थिक एवं भौतिक उन्नति में यह वर्ग  एक महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करता है l

प्रश्न 12. आज की पीढ़ी द्वारा प्रकृति के साथ किस तरह का खिलवाड़ किया जा रहा है। इसे रोकने में आपकी क्या भूमिका होनी चाहिए।

उत्तर- आज की युवा पीढ़ी वृक्षों की कटाई करके,  सुंदर प्राकृतिक पर्वतीय स्थलों पर जाकर गंदगी फैला कर,  नदियों – तालाबों आदि के पानी को दूषित करके  तथा यहां – वहां कचरा आदि फैलाकर  पर्यावरण को दूषित कर रही है l आज हम लोगों ने अपनी सुख-सुविधाओं के लिए  प्रकृति के हर स्वरूप को दूषित कर डाला है l  चाहे वह मिट्टी हो ,पर्वत हो, नदियां हो , या फिर वायु हो l मानवीय गतिविधियों के चलते आज प्राकृतिक संतुलन बड़ी तेजी से गड़बड़ा रहा है l यदि समय रहते हमने इस संतुलन को बनाए रखने के लिए प्रयास नहीं किया , तो वह दिन दूर नहीं जब प्रकृति रौद्र रूप धारण करके संपूर्ण मानव प्रजाति का विनाश कर देगी l  हमें प्रकृति  के संरक्षण के लिए  अधिक से अधिक वृक्ष लगाने चाहिए , जल स्रोतों को दूषित करने से बचना चाहिए , पर्यटन स्थलों पर गंदगी फैलाने से बचना चाहिए  , पॉलीथिन के उपयोग को सीमित करते हुए समाप्त कर देना चाहिए , पशु – पक्षियों के प्रति उदारता दिखानी चाहिए  तथा  निजी  वाहनों आदि का कम से कम उपयोग करना चाहिए l

प्रश्न 13. प्रदूषण के कारण स्नोफॉल में कमी का जिक्र किया गया है? प्रदूषण के और कौन-कौन से दुष्परिणाम सामने आए हैं, लिखें।

उत्तर – प्रदूषण के चलते आज प्रकृति के हर  क्षेत्र में संतुलन बिगड़ रहा है l जिनके कारण हमें नित नवीन परेशानियों एवं प्राकृतिक आपदाओं का  सामना करना पड़ रहा है l  कहीं अतिवृष्टि हो रही है, तो कहीं अनावृष्टि ,  कहीं पर भूकंप आ रहा है , तो कहीं पर ज्वालामुखी विस्फोट हो रहे हैं , प्रकृति का ऋतु चक्र भी परिवर्तित हो रहा है l  अनेक प्रकार के शारीरिक रोग जन्म ले रहे है , नई-नई महामारिया जन्म ले रही हैं l  वर्तमान में जिस कोरोना महामारी से  पूरा विश्व त्रस्त है, उसका एक कारण प्रकृति से छेड़छाड़ करना भी है l यदि हमने प्रकृति से छेड़छाड़ करना बंद नहीं किया , तो वह दिन दूर नहीं जब  प्रकृति रौद्र रूप धारण करके मानव सभ्यता को  लील जाएगी l

प्रश्न 14. ‘कटाओ’ पर किसी भी दुकान का न होना उसके लिए वरदान है। इस कथन के पक्ष में अपनी राय व्यक्त कीजिए?

उत्तर- ‘कटाओ’ को अपनी स्वच्छता और सुंदरता के कारण हिंदुस्तान का स्विट्जरलैंड कहा जाता है l  ‘कटाओ’ की प्राकृतिक सुंदरता के बचे रहने का मुख्य कारण  यहां मनुष्य का सीमित मात्रा में पहुंचना और यहां पर दुकानों का ना होना है l  दुकाने नहीं होने के कारण  यहां पर खाने – पीने की चीजों के खाली पैकेट ,  पॉलिथीन  और खाली बोतलें इधर-उधर पड़ी हुई नहीं मिलती हैं l जिससे यह स्थान प्रदूषण से मुक्त है और यहां का प्राकृतिक सौंदर्य ज्यों का त्यों बना हुआ है l इसलिए यहां पर दुकानों का ना होना भी इस स्थान के लिए एक वरदान के समान ही है l

प्रश्न 15. प्रकृति ने जल संचय की व्यवस्था किस प्रकार की है?

उत्तर- प्रकृति का  प्रकृति का जल संचय का एक अपना अनुपम और अनूठा  तरीका है l ऊंचे – ऊंचे पर्वतों की चोटियों पर पानी बर्फ के रूप में गिरता है और इन चोटियों पर जम जाता है l बर्फ से ढकी यह पर्वत चोटियां ऐसी प्रतीत होती हैं , जैसे जल स्तंभ हो l ग्रीष्म ऋतु में जब प्राणी मात्र को जल की आवश्यकता होती है , तब यह बर्फ पिघल कर नदियों के रूप में मैदानी इलाकों  मे चारों तरफ हरियाली लाते हुए लाखों-करोड़ों कंठों  की प्यास बुझाते हुए ,अतिरिक्त जल  के रूप में समुद्रों में जा गिरता है l समुद्र से पानी का वाष्पीकरण होता है और बादल बनते हैं और यह बादल संपूर्ण पृथ्वी पर  वर्षा करके पानी  का एक व्यवस्थित वितरण करते हैं l इस प्रकार प्रकृति की जल संचय एवं वितरण की प्रणाली अपने आप में अनूठी  और सराहनीय है |

प्रश्न 16. देश की सीमा पर बैठे फ़ौजी किस तरह की कठिनाइयों से जूझते हैं? उनके प्रति हमारा क्या उत्तरदायित्व होना चाहिए?

उत्तर- देश की सीमाओं पर बैठे फौजी देशवासियों के लिए अनेक प्रकार की कठिनाइयों एवं संघर्षों का सामना करते हैं l बर्फ से ढके ऊंचे – ऊंचे निर्जन पहाड़ों पर हाड़ कंपाती सर्दी में वे देशवासियों की रक्षा के लिए दिन-रात पहरा देते हैं,  भीषण तपती गर्मी एवं चिलचिलाती धूप में वे  झुलसा देने वाले तपते मरुस्थल में  दुश्मनों की हर चाल को विफल कर देने के लिए तैनात रहते हैं l भयंकर एवं हिंसक जंगली जानवरों तथा मनुष्य को काल के मुख में पहुंचा देने वाले  विष – जंतुओं के बीच में रहकर वे देश की सीमाओं की रक्षा करते हैं l वह हर समय दुश्मन के प्रहार को सहने के लिए तत्पर रहते हैं , जिससे देशवासियों को सुरक्षित रख सके |

हमारा यह कर्तव्य बनता है कि ऐसे कलि दधीचियों  का हम पूर्ण हृदय से सम्मान करें l उनकी राष्ट्र निष्ठा  और समर्पण को सलाम करना चाहिए  तथा उनके परिवारों को भी यथेष्ट सम्मान देना चाहिए l

अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर

प्रश्न 1. लेखिका ने ‘छाया’ और ‘माया’ का अनूठा खेल किसे कहा है?

उत्तर- लेखिका ने यूमथांग के रास्ते पर दुर्लभ प्राकृतिक सौंदर्य देखा।  उन्होंने देखा कि वहां पर कहीं गहरी हरियाली फैली थी तो कहीं हल्का पीलापन दिख रहा था। कहीं-कहीं नंगे पत्थर ऐसे दिख रहे थे जैसे प्लास्टर उखड़ी पथरीली दीवार हो। देखते ही देखते आँखों के सामने से सब कुछ ऐसे गायब हो गया, जैसे किसी ने जादू की छडी फिरा दी हो, क्योंकि बादलों ने सब कुछ ढक लिया था। प्रकृति के इसी दृश्य को लेखिका ने छाया और माया का खेल कहा है।

प्रश्न 2. लेखिका ने किसे और क्यों जीवन का वास्तविक आनंद कहां है ?

उत्तर – लेखिका ने  जीवन की निरंतरता एवं गति का अनुभव  कराने वाले पर्वतों , नदियों, झरनों,  फूलों से सजी  वादियों आदि के दुर्लभ प्राकृतिक नजारों को देखकर सोचा कि पल भर में ब्रह्मांड में कितना  कुछ घटित हो रहा है। निरंतर प्रवाहमान झरने, वेगवती तीस्ता नदी, उठती धुंध ,ऊपर मँडराते आवारा बादल, हवा में हिलते प्रियुता और रूडोडेंड्रो के फूल सभी लय और तान में प्रवाहमान हैं। ऐसा लगता है। कि ये चरैवेति-चरैवेति का संदेश दे रहे हैं। उसका ऐसा कहना पूर्णतया उचित है क्योंकि इसी चलायमान सौंदर्य में जीवन का वास्तविक आनंद छिपा है।

प्रश्न 3 . सुबह-सुबह लेखिका को अपनी बालकनी से निराशा का अनुभव क्यों हुआ ?

उत्तर – लेखिका को बताया गया था कि मौसम साफ होने पर  उनके होटल की बालकनी से कंचनजंगा की चोटी स्पष्ट दिखाई देती है l लेखिका कंचनजंगा की चोटी को देखने की जिज्ञासा में सुबह – सुबह उठते ही दौड़कर बालकनी में पहुंची, परंतु उन्हें यह देख कर निराशा हुई कि आज मौसम साफ नहीं था l आसमान बादलों से घिरा हुआ था और कंचनजंगा की चोटी दिखाई नहीं दे रही थी l

प्रश्न 4. इस पाठ के माध्यम से  लेखिका ने क्या संदेश देने का प्रयास किया है ?

उत्तर – लेखिका इस पाठ के माध्यम से यह संदेश देना चाहती हैं कि प्राकृतिक सौंदर्य की शरण में जाकर मनुष्य अपने  सभी  अवसादो और चिंताओं से मुक्त हो जाता है l  प्रकृति की शरण में जाकर ही मनुष्य को जीवन के वास्तविक आनंद की अनुभूति होने लगती हैं l साथ ही लेखिका इस पाठ के माध्यम से प्रकृति संरक्षण का संदेश देते हुए,  प्रकृति के प्रति हमारे कर्तव्य का बोध भी कराना चाहती हैं l लेखिका ने इस पाठ के माध्यम से भारत  के निवासियों की आस्था और विश्वास तथा जीवन के संघर्ष को भी सामने रखने का प्रयास किया है l लेखिका ने इस पाठ में  देश की रक्षा के लिए दिन-रात तैनात रहने वाले फौजियों  के साहस और त्याग को भी सम्मान देने का प्रयास किया है l

मूल्यपरक प्रश्न

प्रश्न 1. देश की सीमा पर बैठे फ़ौजी कई तरह से कठिनाइयों का मुकाबला करते हैं। सैनिकों के जीवन से किन-किन जीवन मूल्यों को अपनाया जा सकता है? (SA II All India-2015)

उत्तर- देश की सीमा पर बैठे फ़ौजी अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों में देश की रक्षा करते हुए कठिनाइयों का मुकाबला करते हैं।  यह  फौजी तपते मरुस्थलो ,बर्फ से  जमे पर्वतों तथा अंधकार में डूबे घने एवं भयानक जंगलों में जान हथेली पर रखकर दिन-रात देश की सीमाओं की रक्षा करते हैं l हम इन फौजियों से  साहस , कर्तव्यनिष्ठा,  राष्ट्रप्रेम , राष्ट्र के प्रति समर्पण , राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देने की भावना तथा विषम परिस्थितियों में भी धैर्य एवं संयम का पालन करने जैसे जीवन मूल्यों को अपना सकते हैं l

प्रश्न 2. ‘साना-साना हाथ जोड़ि’ पाठ में कहा गया है कि ‘कटाओ’ पर किसी दुकान का न होना वरदान है, ऐसा क्यों? भारत के अन्य प्राकृतिक स्थानों को वरदान बनाने में युवा नागरिकों की क्या भूमिका हो सकती है? (CBSE. S.P 2015)

उत्तर- ‘कटाओ’ पर किसी दुकान का न होना वरदान है क्योंकि दुकाने ना होने के कारण वहां पर खाने – पीने की वस्तुओं आदि के खाली पैकेट, पॉलिथीन , प्लास्टिक की बोतलें आदि यहां – वहां  बिखरी हुई नहीं मिलती है  और इस कारण यह स्थान प्रदूषण से मुक्त है l प्राकृतिक स्थानों के सौंदर्य को बनाए रखने में हमारी महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है l इसके लिए हमें निम्नलिखित दायित्वों का पालन करना चाहिए –

* खाने पीने की वस्तुओं के खाली पैकेट  तथा बोतलों को इधर-उधर नहीं फेंकना चाहिए l

* प्राकृतिक तत्व एवं जीव जंतुओं को नुकसान पहुंचाने से बचना चाहिए l

* पर्यटन स्थलों पर स्वच्छता एवं साफ सफाई को बनाए रखने के लिए अपनी सक्रिय सहभागिता देनी चाहिए l

* ऐसे स्थलों पर निजी वाहनों का प्रयोग करने से बचना चाहिए l

* प्राकृतिक जल स्रोतों को दूषित करने से बचना चाहिए l

प्रश्न 3. ‘जाने कितना ऋण है हम पर इन नदियों का’ लेखिका ने ऐसा क्यों कहा है? इन नदियों का ऋण चुकाने के लिए। आप क्या-क्या करना चाहेंगे?

उत्तर – नदियों को जीवन का आधार माना जाता है l नदियां प्राणी मात्र की प्यास  बुझाती हैं , हरियाली लाती हैं  तथा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मनुष्य के जीवन में अपना महत्वपूर्ण योगदान देती हैं l इसी कारण से लेखिका ने नदियों का हम पर ऋण होने की बात कही है और यही कारण है कि आदि काल से मनुष्य  ने नदियों को देवियों की और माताओं की संज्ञा दी है और भिन्न – भिन्न प्रकार से उनके प्रति अपनी आस्था और श्रद्धा को प्रकट करता आया है l

परंतु वर्तमान में मानवीय गतिविधियों के चलते ही नदियां प्रदूषण का शिकार हो रही हैं  और इनके  जीवनदायिनी स्वरूप पर संकट खड़ा हो गया है  अतः हमारा यह दायित्व है कि हम इन नदियों को स्वच्छ बनाए रखने में अपना योगदान दें  नदियों का ऋण चुकाने के लिए हम निम्नलिखित कार्य कर सकते हैं –

* हमें  नदियों में कूड़ा करकट डालने से बचना चाहिए

* नदियों के आसपास गंदगी फैलाने से बचना चाहिए

 *नदियों के बहाव क्षेत्र में मकान बनाकर उनका मार्ग अवरोधित करने से बचना चाहिए

* नदियों में पूजन सामग्री आदि प्रवाहित करने से बचना चाहिए

* मृत व्यक्तियों की मुक्ति की कामना से  नदियों में उनके मृत शरीरों और  अस्थियों व राख को प्रवाहित करने से बचना चाहिए |

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