रागों का समय सिद्धान्त Class 12 | Principle of Ragas | Hindustani Music |

4
(1)

रागों का समय सिद्धान्त Class 12 | Raago ka Samay Siddhant in Hindi | Hindustani Music | CBSE |

Raago ka Samay Sidhant

प्र0 1 . हिन्दुस्तानी संगीत में रागों के समय – सिद्धांत के संबंध में अपने विचार दीजिए ।

प्र0 2 हिन्दुस्तानी संगीत में रागों के समय चक्र पर निबंध लिखो ।3

  1. रागों के समय सिद्धांत का संक्षिप्त वर्णन कीजिए ।
  2. रागों के समय सिद्धांत के बारे में आप क्या जानते है ?

उत्तर:  रागों का समय – सिद्धांत — हमारे परंपरागत संस्कारों का परिणाम रागों का समय – सिद्धांत है । रागों के समय सिद्धांत का वर्णन सर्वप्रथम नारद मुनि ने अपने द्वारा रचित ग्रंथ संगीत मकरंद में किया । उन्होंने यह ग्रंथ नौंवी शताब्दी में लिखा। संगीत सकरद में तीसरे अध्याय में रागों के समय सिद्धांत का पूरा वर्णन मिलता है । यह संभव है कि रागों का समय सिद्धांत संगीत मकरंद से भी पहले का है , परंतु संगीतकारों के अनुसार संगीत मकरंद से पहले जो भी ग्रंथ थे। उनमें रागों के समय सिद्धांत का कोई भी वर्णन नहीं है । भारतीय संगीत की यह निजी विशेषता है कि उसके रागो को गाने – बजाने का निश्चित समय होता है । भैरव प्रातः काल ही  गाया जाएगा और मालकौंस रात्रि में ही गाया जाएगा । कुछ ऐसे भी राग है जो ऋतु विशेष मे ही गाये जाएंगे जैसे बसंत बहार , बसंत ऋतु में राग  मेघ मल्हार वर्षा ऋतु के ही गाए व बजाये जाते है ।

प्रत्येक राग निश्चित समय पर गाने पर ही आनन्द प्रदान करता है । चाहे अपवाद भले ही मिले पर नियम यही रहा है । रागों को समय की दृष्टि से निर्धारित करने के लिए निम्नलिखित सिद्धात माने गए है ।

  1. स्वर संयोग समय निर्धारण – इस वर्ग में राग लगने वाले कोमल व शुद्ध स्वरों को अनुसार रागों का समय निर्धारण किया जाता है । इनके तीन वर्ग है।

(क) कोमल रे,  ध वाले राग

(ख) शुद्ध रे ध वाले राग

(ग) कोमल  नि  वाले राग

(क). कोमल रे  , वाले राग – इस वर्ग के राग सुबह 4 से 7 बजे तक गाये  व बजाये जाते है । यह समय दिन व रात का संधिकाल होता है । इसलिए इस समय गाये जाने वाले रागों को संधि – प्रकाश राग कहते है । यह समय दिन में दो बार आता है। सुबह 4 से 7 बजे तक व शाम को 4 से 7 बजे तक । सुबह के संधि – प्रकाश रागों में शुद्ध मध्यम लगता है , जैसे राग भैरव। सांयकाल के संधि – प्रकाश रागों में तीव्र मध्यम लगता है , जैसे- राग मारवा और पूर्वी । इस वर्ग के राग गोघूलि में हमारे मनोभावों की अभिव्यक्ति अपेक्षाकृत अधिक प्रभावपूर्ण ढंग से कर सकते है ।

(ख.)  शुद्ध रे , ध  वाले राग —  संधि – प्रकाश रागों के बाद शुद्ध रे , ध वाले रागों का समय आता है । यह सुबह 7 से 10 बजे तक का समय होता है । यदि कोमल रे अधजगी मुद्रा का परिचायक होता है तो शुद्ध रे पूर्ण जागरण का 1 मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह क्रम  उपयुक्त प्रतीत होता है । सुबह 7 से 10 बजे तक गाये जाने वाले रगों मे अल्हया बिलवाल आदि राग आते है। इनमें शुद्ध रे , ध के साथ शुद्ध मध्यम लगता है तथा रात के 7 से 10 बजे तक के रागो में तीव्र मध्यम लगता है जैसे – यमन और बिहाग ।

 (ग). कोमल ग , नी वाले राग –   शुद्ध रे , ध वाले रागों के बाद कोमल ग , नी वाले राग आते है । इनका समय प्रातः 10 बजे से अपराहन 4 बजे तक होता है और रात्रिकाल में भी 10 बजे से प्रातः  4 बजे तक होता है । इस वर्ग में रागो की संख्या अधिक है क्योंकि इस वर्ग का समय भी अधिक है । ये राग इस समय की मनोदशा की बहुत सुंदर अभिव्यक्ति करते है । दिन के रागों में जौनपुरी , तोड़ी आदि राग आते है और सायंकालीन रागों मे भैरवी, काफी आदि राग आते है ।

You may also read राग वर्गीकरणAll Definitions in Music, MCQ of Hindustani Music Vocal for better understanding and scoring higher.

  1. मध्यम के प्रयोग से समय निर्धारण — रागों के समय निर्धारण व व्यक्तित्व के निर्माण में मध्यम ( म ) स्वर का बहुत महत्व है यह सप्तक के मध्य का स्वर है । प्रातः कालीन रागो में शुद्ध मध्यम लगता है , जैसे भैरव राग और रात्रिकालीन रागो में तीव्र मध्यम लगता है , जैसे – राग यमन । राग दुर्गा और राग देश इसके अपवाद है । ये सांयकालीन राग है पर इनमें शुद्ध मध्यम लगता है । दिन के समय शुद्ध मध्यम वाले रागों की अधिकता होती है । परंतु रात्रि के बढ़ने के साथ – साथ तीव्र मध्यम का प्रयोग इतना अधिक बढ़ जाता है कि वह स्वयं ही रात के 12 बजे तक रागों का राजा बना रहता है तथा शुद्ध मध्यम ‘ म ‘ को अपने समीप नहीं आने देता । रात्रि दलने के साथ – साथ तीव्र मध्यम का प्रयोग भी कम हो जाता है ।
  2. वादी – संवादी से समय निर्धारण – जिन रागों के वादी स्वर सप्तक के पूर्वांग में होते है उन्हें पूर्वांग वादी राग कहते है, तथा उनका गायन समय पूर्वार्ध अर्थात दिन के 12 बजे से 12 बजे तक होता है । जिन रागों का वादी स्वर सप्तक के उत्तरांग में होता है , उनका गायन समय दिन का उत्तरार्ध होता है । उत्तरार्ध रात्रि के 12 बजे से दिन के 12 बजे तक होता है ।
  3. पूर्वांग और उत्तरांग प्रबल राग – जिन रागों का पूर्व अंग प्रबल है या जो सप्तक के पूर्व अंगों में ज्यादा गाये जाते है । ये दिन के पूर्वार्ध में गाये – बजाये जाते है । जिन रागों का उत्तरांग ज्यादा प्रबल होता है , वे दिन के उत्तरार्ध में गाए जाते हैं । पूर्वांग प्रबल राग भीमपलासी , केदार और उत्तरांग प्रबल राग जौनपूरी , बसंत आदि ।
  4. ऋतुओं के अनुसार समय निर्धारण– कुछ राग विशिष्ट ऋतु में गाने से अत्यंत आनंद प्रदान करते है । ऋतुकालीन राग होने के कारण इन्हें 24 घण्टे गाया बजाया जा सकता है , जैसे बसंत ऋतु में बसंत राग और वर्षा ऋतु में मेघ राग । इन रागों के स्वर चित्र सहित भी मिलते है । इसका प्रधान कारण यह है कि इन रागों की प्रकृति गायन व शब्द चित्र में बहुत समानता होती है ।
  1. गीत के अर्थ का गायन से संबंध — गीत के अर्थ के आधार पर भी रागों का समय निर्धारित होता है । जिन गीतो में प्रात कालीन शब्दों का अधिक प्रयोग होता है , उन्हें प्रातः काल में गाया जाना चाहिए और जिन गीतों में रात्रिकाल का वर्णन होता है उन्हें रात्रिकालीन रागों में ही गाया जाना चाहिए ।

रागों के समय सिद्धांत का आलोचनात्मक विवरण–  भारतीय संगीत की यह निजी विशेषता है कि रागों को उनके निश्चित समय पर गाया बजाना चाहिए । निश्चित समय के अनुसार यदि राग न गाया बजाया जाए तो यह अपना विचित्र प्रभाव नहीं पड़ता और श्रोताओं को आनन्द की अनुभूति नहीं होती । परन्तु आज यह सवाल उत्पन्न हो रहा है कि रागों का समय सिद्धांत सही है भी या नहीं । कही यह मनगढ़ंत सिद्धांत तो नही ? जो लोग रागों को उनके निश्चित समय पर गाने बजाने के सिद्धांत को बिल्कुल सही मानते है , उन का कहना है कि राग और रस का आपस में गहरा संबंध है । प्रत्येक स्वरों का अपना रस व आनन्द होता है । जिस प्रकार रे   कोमल स्वर करुण रस की अभिव्यक्ति करते है और रे शुद्ध भक्ति रस के परिचायक है । अतः उपरोक्त स्वर संगीत मधुरता का प्रमुख कारण है । जब  सुबह होती है तब मन शांत व गम्भीर होता है । इसलिए उस समय कोमल स्वर मन को आनंद से भरपूर करते है । इसी  प्रकार जैसे – जैसे दिन अपने चरण बढ़ाता है उसी प्रकार मनोभाव भी परिवर्तित हो जाते है , अतः मनोभावों के परिवर्तन के अनुसार ही स्वरों की भिन्नता आवश्यक होती है ।

कुछ लोगों का तर्क है कि प्राचीन समय में जब संगीतकारों को राज आश्रय प्राप्त था तब उन्हे राज दरबार में निर्धारित समय अनुसार ही रागों को गाना पड़ता था । उसी कारणवश उन संगीतकारों ने रागों का गायन समय अपने गाने के अनुरूप बना दिया । अतः इस समय सिद्धांत को स्वीकार नहीं किया जा सकता ।

निष्कर्ष 

रागों के समय निर्धारण में विद्वानों के विभिन्न मत है । उत्तर भारतीय रागों के प्रदर्शन के लिए समय का प्रतिबंध मनोवैज्ञानिक क्रियाओं पर आधारित माना गया है । एक विद्वान के मतानुसार ये सभी प्रतिबंध हमने अपने लिए लगा रखे है। इनकी पृष्ठभूमि हमारे मंदिरों , नाट्यशालाओं और उत्सवों में है। आज के व्यस्त जीवन में इतना समय किसके पास है कि वह रागों को निश्चित समय पर गाये , बजाये या सुने । संगीत का उद्देश्य होता है मन को रंजक करना , रागों को समय सिद्धांत के  बंधन के रूप में न बांधकर  रंजको जन चित्तानामा का उद्देश्य सामने रखकर विवेक के आधार पर करना चाहिए । रागों के समय सिद्धांत को पथ निर्देशक के रूप में सीमित रखना चाहिए।

Related

 

# रागों का समय सिद्धान्त Class 12

 

Do share the post if you liked रागों का समय सिद्धान्त Class 12. For more updates, keep logging on BrainyLads

How useful was this post?

Click on a star to rate it!

Average rating 4 / 5. Vote count: 1

No votes so far! Be the first to rate this post.

Add a Comment

Your email address will not be published.

error: Content is protected !!

Wish to Stay Updated

Join Us on Telegram

Click Here to Join