All Definitions in Music | Hindustani Music | Class XII | CBSE |

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अलंकार

प्रश्न:- अलंकार किसे कहते है ? इसका महत्व बताइए । कोई पांच अलंकार लिखो ।

 उत्तर:- अलंकार शब्द संस्कृत भाषा का है । जिसका अर्थ है सजाना । जिस प्रकार शरीर को सजाने के लिए  आभूषण की आवश्यकता होती है उसी प्रकार गायन , वादन को सजाने वाले स्वर , समूह की जरूरत होती है । उसे अलंकार कहते हैं । यह स्वर समूह एक नियमित क्रम में होते है और इनका प्रयोग विभिन्न लयों के आधार पर सीधे या उल्टे क्रम से किया जाता है । अलंकार में आरोही , अवरोही दोनों वर्ण होते है । अलंकार का यह नियम है कि जो क्रम एक अलंकार आरोही में होता है उसका उल्टा क्रम को अवरोही में होना अति आवश्यक है जैसे – सा सा , रे रे , गग , मम , पप , धध , निनि , सां सां ।

सां सां , निनि , धध , पप , मम , गग , रेरे , सासा । अलंकार शुद्ध स्वरों के अतिरिक्त तीन कोमल स्वर लगाकर भी बनाए जा सकते है, परंतु अलंकार बनाने में यह ध्यान रखना चाहिए कि जिस राग में जो स्वर लगते हैं उन्ही स्वरों को उस राग के अलंकार में प्रयुक्त करना चाहिए । नियमित क्रम से की गई रचना को ही अलंकार या पलटा कहते है ।

अलंकार के चार भाग होते है ।

अ)  स्थाई

ब ) आरोही

स)अवरोही

द) संचारी

अलंकार को चार वर्गों में बांटा जा सकता है –

  1. सरल अलंकार 
  2. अर्ध जटिल अलंकार 
  3. जटिल अलंकार
  4. मेरुखण्ड अलंकार 

अलंकार का महत्व –  नाट्यशास्त्र में भरत मुनि का कहना है कि अलंकार के बिना गीत वैसा ही प्रतीत होता है जैसे चंद्रमा के बिना रात्रि, जल के बिना नदी , पुष्ण के बिना लता , आभूषण के बिना नारी शोभा नहीं देती ठीक वैसे ही अलंकार के बिना गायन वादन शोभा नहीं देता । अलंकार के अभ्यास से स्वर ज्ञान बढ़ता है और लय की सही जानकारी होती है । अलंकारों के अभ्यास से कंठ सध जाता है । वादक के हाथ की उंगलियां अपने साज के लिए सध जाती है । अलंकारों का निरंतर अभ्यास गायन , वादन की रचनात्मक प्रकृति को भी बढ़ावा देता है । यह स्वरलीला है स्वर का प्राण है। अतः स्पष्ट है कि अलंकारों के बिना संगीत पूर्ण नहीं है ,अतः संगीत के विद्यार्थियों  को चाहिए कि अलंकारों का निरंतर अभ्यास अत्यन्त आवश्यक है । कुछ अलंकार विद्यार्थियों के अभ्यास के लिए दिए गए है:-

अलंकार

  1. स रे ग म प ध नि सं

सं नि ध प म ग रे स ।

  1. सस , रेरे , गग , मम , पप , धध , निनि , संसं

संसं , निनि , धध , पप , मम , गग , रेरे , सस ।

  1. सारेग , रेगम , गमप , मपध, पधनि , धनिसां ।

संनिध , निधप , धपम , पमग , मगरे , गरेसा ।

  1. सरेगम रेगमप , गमपध , मपधनि , पधनिसं । संनिधप , निधपम , धपमग , पमगरे , मगरेसा ।
  2. सरेसरेग , रेगरेगम , गमगमप , मपमपध , पधपधनि , धनिधनिसां , संनिसंनिध , निधनिधप , धपधपम , पमपमग , मगमगरे , गरेगरेस ।

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खटका

प्र. खटका किसे कहते है ?

उत्तर:- खटका का अर्थ है भय , संदेह इत्यादि । यह एक प्रकार का अलंकार विशेष है । किसी एक स्वर को आगे पीछे के स्वरों के साथ शीघ्रता से उत्पन्न करने को खटका कहते है । खटका प्राचीन गमक का ही एक प्रकार है । इसके प्रयोग से किसी भी रचना की सौंदर्य वृद्धि होती है इसे इस प्रकार लिख सकते है – जैसे ( प ) गाने के लिए पधमप अथवा पधपमप , गाते है । इसको लिखने के लिए स्वर को कोष्ठक में लिखते है ।

मींड

मींड गाने अथवा बजाने की एक क्रिया का नाम है । जब किसी एक स्वर की ध्वनि को खंडित किए बिना दूसरे स्वर तक जाया जाता है तो उसे सांगीतिक शब्दावली में मींड कहा जाता है । गाने बजाने में मींड का प्रयोग बडा सुंदर प्रतीत होता है । जैसा प ध नि सां। यहाँ  ‘प’ से तारे ‘सां’ तक मींड दिखाई गई है । इसे गाते समय प से सां तक इस प्रकार कोमलतापूर्वक गाया जाता है कि बीच के स्वर ध और नि बिना ध्वनि खंडित किये जाये । सितार वाद्य पर भी किसी एक पर्दे पर हाथ रखकर दाहिने हाथ से मिजराब की चोट लगाकर आवाज को खंडित किये बिना तार को खींचकर दूसरे स्वर की आवाज निकाली जाती है । इस प्रकार मींड द्वारा एक ही पर्दे पर दो, तीन , चार या इससे भी अधिक स्वर बजाये जा सकते है । यह क्रिया अभ्यास द्वारा सिद्ध होती है । स्वरलिपि में मींड की क्रिया को दर्शाने का चिन्ह उल्टा अर्धचंद्र है ।

मींड की क्रिया करने के दो प्रकार है – अनुलोम मींड और  विलोम मींड ।

  1. अनुलोम मींड- अनुलोम मींड वह है जिससे सितार पर पहले दाहिने हाथ से मिजराब की पोट लगाई जाती है और फिर बायें हाथ से तार को खींचकर पर्दे पर अगले स्वर की आवाज निकाली जाती है । जैसे स के पर्दे पर अंगुली रखकर दाहिने हार से मिजराब की चोट लगाने के पश्चात तार को खींचकर रे और ग स्वर तक ले जाया जाता है। अनुलोम मींड की क्रिया आरोही क्रम में होती है ।
  2. विलोम मींड- अनुलोम मींड के विपरीत विलोम की क्रिया होती है । विलोम की क्रिया में पहले तार का निश्चित स्तर तक खीच कर ले जाया जाता है और तत्पश्चात मिजराब की चोट लगाई जाती है । जैसे सा के पर्दे से तार को अंदाजे से खींचकर ‘ ग स्वर तक ले जाना और तत्पश्चात् दाहिने हाथ से मिजराब का आघात करने के पश्चात् रे से होते हुए वापिस ‘ स ‘ स्वर में मिलना , विलोम मींड की क्रिया है । यह क्रिया अवरोह क्रम में होती है ।

अनुलोम और विलोम मींड की क्रिया स्वर ज्ञान और अभ्यास से ही सिद्ध होती है । आरंभ में विद्यार्थियों को केवल एक ही स्वर की मींड का अभ्यास करना चाहिए । अच्छे स्वर ज्ञान तथा उचित अभ्यास से कुशल वादक एक ही पर्दे पर चार – पांच स्वरों की मींड बड़ी सरलतापूर्वक ले लेते है । इस क्रिया से वादन में निखार पैदा होता है और श्रोताओं को भी आनन्ददायक लगता है ।

कण स्वर

प्र. कण अथवा स्पर्श स्वर किसे कहते है ?

 उत्तर:-   भारतीय संगीत में गायन अथवा वादन को मधुर बनाने के लिए स्वरों में सूक्ष्म अंगों का प्रयोग किया जाता है । मुख्य स्वरों पर अन्य स्वरों का स्पर्श करने से मुख्य स्वरों की मधुरता बढ़ती है । जैसे धैवत मुख्य स्वर को कहते समय निषाद स्वर के स्पर्श स्वर का प्रयोग धैवत स्वर की मधुरता को बढ़ा देता है । स्पर्श स्वर को कण स्वर भी कहते है । यह स्वर गले के तैयार होने पर ही सरलता से निकलते है । कण स्वर को लिखने के लिए मुख्य स्वर पर स्वर लिख दिया जाता है । उस छोटे स्वर को ही कण रूप में प्रयुक्त किया जात है । जैसे – प ( पंचम पर धैवत का कण )।

कण एक अलंकारिक स्वर है जिसका उद्देश्य संगीत की रचनाओं को सजाना और संवारना है । कण स्वर दो प्रकार के होते है –

क. पूर्व लगन कण

ख. अनुलगन कण

 

क:- पूर्व लगन कण – पूर्व लगन कण का प्रयोग मूल स्वर से पहले किया जाता है । जैसे ‘ग’ स्वर है उसे रे का कण देना है । मूल स्वर गांधार ( ग ) पर बाई और रे का कण।

ख.  अनुलगन कण – इस मूल स्वर के बाद कण स्वर बोला जाता है । जैसे- ‘ग’ मूल स्वर है तो ‘म’ का कण देना है तो पहले ‘ ग ‘ गाकर बाद में ‘ म’ का कण देंगे और उसे लिखेंगे  ग^म ” । ( गांधार स्वर पर मध्यम का कण )

कण स्वर का प्रयोग करने के लिए गाने में कुशलता आनी चाहिए नहीं तो राग बिगड़ सकता है ।

गमक 

 प्र.  गमक किसे कहते है ? इसका महत्व बताइए ।

उत्तर: गमक – संगीत रलाकर में गमक की व्याख्या इस प्रकार की है गमक ऐसे स्वर कंपन को कहते है जो श्रोता के चित्त को सुख प्रदान करता है । इसकी उत्पत्ति संस्कृत धातु ‘गम’ से हुई है , जिसका अर्थ है- चलना । गमक मे स्वर को एक विशेष प्रकार से हिलाया जाता है । सितार में गमक लेते समय झटके से किसी एक स्वर से दूसरे स्वर पर जाते है। बाएँ हाथ की उगली को सितार के किसी पर्दे पर रखकर उस स्वर को बजाते हुए अगले या पिछले परदे पर जाना ही गमक कहलाता है । गायन में स्वरों को गंभीरता से कंपन करके गाने की क्रिया को गमक कहते है । यह एक विशेष प्रकार का स्वर लगाव है । गमक का प्रयोग बहुत तैयारी के बाद ही किया जाना चाहिए । गमक के प्रयोग से विभिन्न रसों की अनुभूति होती है । गमक ही संगीत में रोचकता भरकर श्रोतागण को आत्मविभोर कर देती है । गमक का प्रयोग भारतीय संगीत को पाश्चात्य संगीत से अलग करने वाली एक रेखा है । गमक के प्राचीन ग्रंथों में केवल 15 प्रकार ही बताये गए है । जो निम्न प्रकार से है-

  1. कम्पित
  2. आन्दोलित
  3. आहत
  4. प्लावित
  5. उल्लासित
  6. 6.वलित
  7. हम्फित
  8. त्रिभित्र
  9. स्फुरित
  10. तिरप
  11. मुद्रित
  12. लीन
  13. नामित
  14. मिश्रित
  15. कुरूला

परंतु इनका प्रयोग बहुत अभ्यास के बाद ही संभव है । गमक का प्रचार नोम तोम के आलाप तथा ध्रुपद गायन में होता है । धुपद का प्रचार कम होने से गमक का प्रयोग भी धीरे – धीरे  कम हो गया । ख्याल गायन में इसका प्रयोग नहीं के बराबर होता है । गमक शब्द का प्रयोग प्राचीन काल में होता था और आधुनिक युग में भी होता है किन्तु गमक के प्राचीन और आधुनिक अर्थों में भिन्नता है । यद्धपि वर्तमान समय में गमय का अधिक प्रयोग नहीं होता है परंतु  किसी न किसी रूप में प्रचलित है। जैसे वाद्य संगीत और कंठ  संगीत में इसका प्रयोग अवश्य होता है ।

आलाप

आलाप भारतीय रागों का आधार स्तम्भ है । राग का सम्पूर्ण ढांचा हमें राग के आलाप के माध्यम से समझ आ जाता है । संगीत कला में प्रत्येक स्वर का अपना एक सौन्दर्य और अपना एक निजी महत्व होता है । विभिन्न स्वर संगतियाँ , पकड़ों को जब विविध कल्पनाओं के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है तो उसे आलाप गायन कहते है । शास्त्रीय संगीत के स्वरूप के अनुसार जब मन्द्र सप्तक से मध्य सप्तक , मध्य सप्तक से तार सप्तक के स्वरों तक बढ़त करते हुए और राग के भाव को व्यक्त करते हुए स्वर विस्तार किया जाता है तो वह आलाप की संज्ञा प्राप्त करता है ।

किसी राग में आलाप प्रस्तुत करते हुए गायक राग के वादी , संवादी स्वरों अलंकार व गमक आदि से सजाता भी है । तभी उसकी प्रस्तुति प्रभावशाली बनती है । आलाप में प्रयुक्त स्वरों के स्वरूप व मधुर संयोजक राग का सम्पूर्ण विवरण समक्ष आ जाता है । जैसे वादी, संवादी स्वर कौन से हैं , राग की जाति क्या है ।

आलाप गायन – आधुनिक समय में आलाप गायन दो तरह से किया जाता है । आकार द्वारा और नोमतोम द्वारा । आकार का आलाप आ SSS  के उच्चारण द्वारा किया जाता है । इसमें राग का स्वर विस्तार इकार , उकार और ओंकार आदि में किया जाता है । ख्याल , ठुमरी और टप्पादि लोकगीतियों में उनकी गायन शैली और भाव के अनुसार गीत गाने से पूर्व ओंकारादि द्वारा राग का स्वरूप व्यक्त किया जाता है । थोड़ा सा आलाप करने के पश्चात् गायक एक – एक स्वर की क्रमानुसार लेकर बढ़त करते हैं और कुछ राग वाचक स्वर समुदाय की सहायता से स्वर विस्तार करते हैं । कहीं – कहीं आलाप में शब्दों का प्रयोग करके शब्दालाप द्वारा भावों का प्रदर्शन किया जाता है । बड़े ख्याल में बड़े – बड़े आलाप और छोटे ख्याल में छोटे आलाप , ठुमरी में मधुर और भावुक रूप से छोटे – छोटे आलाप , शब्दालाप तथा टप्पा गायकी में द्रुतलय में स्वर विस्तार किया जाता है ।

नोमतोम के आलाप का प्रयोग ध्रुपद और धमार गायकियों में गायन से पहले किया जाता है । कुछ संगीतज्ञ ख्याल गायन से पूर्व भी इस गायन प्रयोग करते हैं । आलाप गीत के मध्यम में ताल सहित किया जाता है । आलाप नोम तोम हरि ओम नारायण हरि आदि से भी किया जाता है। आलाप राग का दर्पण है।

तान और उसके प्रकार

तान शब्द की उत्पत्ति ‘तन’ धातु से हुई है जिसका अर्थ है तानना अर्थात विस्तार करना । अतः साधारण रूप से उन स्वर समूहों को तान कहते है जिसके द्वारा राग का विस्तार किया जाता है तथा राग को अलंकृत किया जाता है ।

आधुनिक समय में ‘ नग्मातुल हिदे ‘  में लिखा गया है कि ‘स्वरों’ के समूह को तान कहते हैं , जिसका प्रयोजन राग में बढ़त करना होता है । इसमें कम से कम तीन स्वर अवश्य प्रयुक्त होते हैं । आधुनिक समय में पंडित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने तान की परिभाषा व्यक्त नहीं कि लेकिन तान की योग्य रीति क्या है इसका वर्णन अवश्य किया है । वे लिखते हैं कि ” राग गायन को विस्तृत करने के लिए तानों का प्रयोग होता है ।”  मुख्य रूप से तानों का प्रयोजन राग को अलंकृत करना ही है । पंडित ओंकारनाथ ठाकुर जी कहते हैं , ” जब कोई अलंकार किसी राग के नियमों में बंधकर प्रयुक्त होता है , तब वही तान कहलाता है । “

उस्ताद फैयदज खां कहते हैं कि ” मिया रागिनी की खुशामद करने , सजाने संवारने के लिए जिन फिकरों का इस्तेमाल करते हैं , उसे ही तान कहते है । इसी प्रकार उस्ताद बड़े गुलाम अली खां कहते है कि , ” जब मैं राग के दरिया में डूबता हूँ , रागिनी के इश्क में पागल हो जाता हूँ , तो जो चीज मेरे मुख से एक बार निकल जाती है , मै तो उसे तान कहता हूँ । “

उपरोक्त लिखित परिभाषाओं से स्पष्ट हो जाता है कि तान स्वरों का वह समूह है जो राग के विस्तार में प्रयुक्त होता है । यह स्वर समूह राग मे विचित्रता और सौंदर्य वर्धन के लिए भिन्न – भिन्न प्रकार से प्रयोग किया जाता है ।

तानों के प्रकार – 1. शुद्धतान , 2 कूटतान , 3 मिश्र तान , 4.  अलंकारिक तान , 5. छूट तान , 6 जबड़े की तान , 7. फिरत तान , 8. हलक तान , 9. पलट तान , 10. झटके की तान , 11.सरोक तान , 12. खटके की तान , 13 दानेदार तान , 14 अचरक तान , 15. गमक तान , 16 बोल तान , 17 गिटकड़ी की तान , 18. राधांक तान , 19. लड़त तान ।

मूर्च्छना

प्र. मूर्च्छना किसे कहते है ?

 उत्तर:  मूर्च्छना शब्द मूर्च्छ धातु से बना है जिसका अर्थ है चमकना या उभरना । मूर्च्छना शब्द का उल्लेख हमे वैदिक काल से ही प्राप्त होता है। वैदिक साहित्य में महाभारत तथा रामायण और कालिदास के ग्रंथों में भी इस शब्द का व्यापक प्रयोग हुआ है । संगीत के ग्रंथों में मूर्च्छना की परिभाषा भिन्न – भिन्न रूपों में मिलती है । पंडित शारंगदेव जी के अनुसार क्रम से सात स्वरों का आरोह अवरोह करने से मूर्च्छना की रचना होती है अर्थात् सात स्वरों का क्रम से आरोह अवरोह करना मूर्च्छना कहलाता है। मूर्च्छना एक स्वतंत्र स्वर सप्तक है परन्तु उसे ग्राम नहीं कह सकते क्योंकि ग्राम तो यही स्वर सप्तक माना जाता है जो कि मूर्च्छनाओं की उत्पत्ति के समान सप्तक हो प्रत्येक ग्राम में सात स्वर होते है। अतः हर ग्राम के प्रत्येक स्वर को आरंभिक स्वर मानकर आरोह – अवरोह करने से मूर्च्छना बनती है। इस प्रकार दोनों ग्रामों से 7 +7 = 14 मूर्च्छनाएँ बनती है ।

 मूर्छना राग की जन्म भूमि है इसी से राग की उत्पत्ति होती है। शारगंदेव ने मूर्च्छना के चार प्रकार बताये क्योंकि उस समय शुद्ध स्वरों के अतिरिक्त दो विकृत स्वर भी थे – गांधार और काकली निषाद । इस आधार पर उन्होंने मूर्च्छना को चार निम्नलिखित भागों में बांटा है ।

  1. शुद्ध 
  2. अतर संहिता
  3. काकली संहिता
  4. अंतर काकली संहिता

आधुनिक काल में थाट पद्धति प्रचलित हो जाने से मूर्च्छना का महत्व नहीं रहा। आजकल विद्वानों ने रागों मे विचित्रता के लिए मूर्च्छना का प्रयोग होता है । वास्तव में आजकल मूर्च्छना का प्रचार नहीं है। यदि है तो आरोह – अवरोह के रूप में ही संगीतज्ञ इनका प्रयोग करते है ।

मूर्च्छना के लक्षण –

  1. मूर्च्छना ग्राम पर आधारित होती है क्योंकि ग्राम के स्वरों को आरोह – अवरोह करने पर ही मूर्च्छना की प्राप्ति होती है ।
  2. मूर्च्छना में स्वर क्रमानुसार होते है ।
  3. मूर्च्छना में सात स्वर होने चाहिए ।
  4. मूर्च्छना जिस स्वर से आरम्भ होती है उसी स्वर पर आकर समाप्त होती है ।
  5. मूर्च्छना एक स्वर ग्राम है जिसके द्वारा नवीन स्वरग्राम की प्राप्ति होती है ।

वर्ण

प्र.  वर्ण किसे कहते है ? इसका महत्व लिखिए ।

 उत्तर:-    वर्ण – गाने की क्रिया को वर्ण कहते है । वर्ण चार प्रकार के होते है । स्थाई , आरोही , अवरोही व संचारी । पंडित अहोबल जी संगीत पारिजात में वर्ण की परिभाषा के अंतर्गत लिखते हैं कि गायन की क्रिया का स्वरों के पद आदि से विस्तार करने से यह वर्ण कहलाता है ।

  1. स्थाई वर्ण- किसी भी एक स्वर को बार – बार गाने बजाने को स्थाई वर्ण कहते है । स्थाई का अर्थ है – स्थिर होना । अतः जब एक ही स्वर स्थिर अर्थात बार – बार प्रयुक्त करते है , उसे स्थाई वर्ण कहते है । जैसे – स स स , रे रे रे , ग ग ग ।
  2. आरोही वर्ण – नीचे के स्वरों से ऊपर चढ़ते स्वरों को आरोही वर्ण कहते है । जैसे – सा , रे , ग , म , प , ध , नि ।
  3. अवरोही वर्ण – ऊपर के स्वरों से नीचे उतरते क्रम को अवरोही वर्ण कहते हैं । जैसे सा , निY ध, प , म , ग , रे , सा ।
  4. संचारी वर्ण- स्थाई , आरोही , अवरोही वर्णो को मिलाने से संचारी वर्ण की उत्पत्ति होती है इसमें कभी कोई स्वर ऊपर चढ़ता है और कभी नीचे उतरता है । जैसे – सा , रे , ग , म , प ,प, ध , प ।

वर्ण का महत्व –  राग के स्वरूप निर्धारण में वर्ण का महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि केवल स्वरों का भाव आरोह , अवरोह करने से राग स्पष्ट नहीं होता अपितु उसका चलन किस प्रकार है , उसकी प्रकृति क्या है ? उसके गाने का ढंग क्या है, इससे राग का स्वरूप बनता है । अतः जहाँ राग में स्वरों का महत्व है वहां वर्ण का भी विशेष महत्व है । यदि हम अंत में यह कहे कि राग निर्माण में वर्ण का महत्वपूर्ण स्थान है और वर्ण शब्द संगीत की विशालता छिपी है ।

मुर्की

प्र0.  मुर्की किसे कहते है ?

उत्तर:  मुर्की – दो या तीन खड़े स्वरों को जब एक ही आघात में बजाया जाता है तो इस क्रिया को मुर्की कहते है । इस क्रिया का प्रयोग गायन तथा वादन में सौंदर्य बढ़ाने के लिए किया जाता है । जैसे नी अथवा नी नी आदि।  जिस प्रकार रे सा नि बजाने के लिए रे स्वर पर मिजराब लगाते है , मिजराब लगाते ही तर्जनी सा और मध्यम  रे के पर्दे पर मिजराब लगाते ही जब मध्यम तुरंत तार पर से हटेगी तो यह एक प्रकार का झटका देते हुए उठेगी । जिससे सा स्वर धीमा सा सुनाई देगा। जब सा की ध्वनि सुनाई देने लगे तो तर्जनी तुरंत बाज के तार को दबाए हुए झटके से नी पर पहुँचेगी , जिससे नि की ध्वनि हल्की सी सुनाई देगी । इस प्रकार एक ही मिजराब सा, रे , सा , नि एकदम बजेगे । अच्छी प्रकार अभ्यास करने से ही यह क्रिया उत्तम रूप से सिद्ध हो सकती है । मुर्की लिखने के लिए मूल स्वर के ऊपर बाई और दो स्वरों का कण लिख दिया जाता है । जैसे धमप ।

ग्राम

प्र. ग्राम किसे कहते है ? वर्णन कीजिए ।

उत्तर:  ग्राम – प्राचीन काल के संगीत में ग्राम का प्रचलन था । ग्राम शब्द का साधारण अर्थ गाँव है । जिस प्रकार जहां पर बहुत सारे परिवार रहते हो , उसे गाँव कहते है , उसी प्रकार प्राचीन काल की संगीत पद्धति में निश्चित श्रुति अन्तरों के अनुसार सात स्वरों के समूह को ग्राम कहते है । जैसे व्यक्ति से परिवार और परिवारों से गाँव बनता है , उसी प्रकार श्रुति से स्वर और स्वरों से ग्राम बनता है । ग्राम शब्द की परिभाषा देते हुए पंडित शारंगदेव जी लिखते हैं ग्राम स्वरों का ऐसा समूह है जिसमें मूर्च्छनाएँ स्वतंत्र रूप से विचरण कर सके । इससे ज्ञात होता है कि ग्राम और मूर्च्छना का गहरा संबंध है । प्राचीन भारतीय संगीत ग्रन्धों का अध्ययन करने से यह ज्ञात होता है कि ग्राम तीन प्रकार के है जो निम्न प्रकार से है-

  1. पड़जग्राम , 2 . मध्यम ग्राम , 3. गांधार ग्राम

क . षड़ज ग्राम – षड़ज ग्राम सा स्वर से प्रारम्भ होता था । इसका मुख्य स्वर भी सा ही था । यह षड़ज ग्राम आधुनिक काल के काफी थाट के समान है । पडज ग्राम में सा रे ग म प ध नि सात स्वर प्राचीन और मध्यकालीन स्वर स्थापना के आधार पर 22 श्रुतियों पर स्थापित किए हैं । जैसे सा म प की चार – चार रे ध की तीन – तीन और ग नि की दो – दो श्रुति मानी है ।

ख . मध्यम ग्राम – मध्यम ग्राम मध्यम स्वर से प्रारंभ होता था और इसका प्रधान स्वर भी मध्यम स्वर ही था । पंचम की एक श्रुति उतार देने से मध्यम ग्राम की उत्पत्ति होती है। जैसे – 17वीं श्रुति में एक श्रुति उतार देने से मध्यम ग्राम बनता है । यह ग्राम आधुनिक काल के खमाज थाट के समान है ।

 ग . गांधार ग्राम – गांधार ग्राम के संबंध में संगीत शास्त्रों में कुछ विवरण प्राप्त नहीं होता। कहा जाता है कि इसका प्रचलन प्राचीन काल में था। प्राचीन काल में ही इसका लोप होने लगा इसी कारण इसकी स्पष्ट व्याख्या नहीं मिलती । कुछ लोग कहते थे उसे गांधर्व लोगों द्वारा अपनाने के कारण इसका नाम गांधार ग्राम पड़ा । आधुनिक काल में इसका प्रचार बिल्कुल नहीं है ।

ग्राम गाया या बजाया नहीं जाता । इससे मूर्छना जाति अथवा राग की उत्पत्ति होती है । अतः प्राचीन काल में केवल दो ग्राम ही प्रचलित थे पडज ग्राम व मध्यम गाम । कालान्तर मे मध्यम ग्राम का प्रचलन भी कम हो गया भर आधुनिक समय में केवल पड़ज ग्राम का ही प्रयोग रह गया है ।

 

Courtesy : Kamal Kant

 

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