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George Pancham ki Naak | जॉर्ज पंचम की नाक | Hindi A l Kritika l Chapter 2 | पाठ का सार | कमलेश्वर |

 

कमलेश्वर का जीवन परिचय 

कमलेश्वर का जन्म 6 जनवरी 1932 को मैनपुरी, उत्तर प्रदेश में हुआ। इन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम.ए.  की उपाधि प्राप्त की । कमलेश्वर ने साहित्य की विभिन्न विधाओं  उपन्यास, कहानी, नाटक, संस्मरण, पटकथा  आदि  में लेखन किया। दूरदर्शन के अतिरिक्त महानिदेशक के पद पर कार्यरत रहते हुए  कमलेश्वर ने सारिका, दैनिक जागरण और दैनिक भास्कर जैसी कई  प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं का संपादन भी किया।  कमलेश्वर नई कहानी आंदोलन के सूत्रधारों में गिने  जाते हैं l

कमलेश्वर की प्रमुख रचनाएँ हैं – राजा निरबंसियाँ, खोई हुई दिशाएँ, सोलह छतों वाला घर इत्यादि।

कहानी-संग्रह – ज़िंदा मुर्दे, वही बात, आगामी अतीत, डाक बंगला, काली आँधी।

चर्चित उपन्यास – कितने पाकिस्तान,  डाक बँगला, समुद्र में खोया हुआ आदमी, एक और चंद्रकांता , एक सड़क सत्तावन गलियाँ’, ‘डाक बंगला’, ‘तीसरा आदमी’, और ‘काली आँधी’ प्रमुख हैं।

नाटक – ‘अधूरी आवाज़’, ‘रेत पर लिखे नाम’, ‘हिंदोस्ताँ हमारा’ के अतिरिक्त बाल नाटकों के चार संग्रह भी उन्होंने लिखे हैं |

यात्रा संस्मरण – खंडित यात्राएं |

उन्होंने आत्मकथा,  और संस्मरण भी लिखे हैं।

संपादन

पत्रिकाएं  –

  • विहान-पत्रिका
  • नई कहानियाँ-पत्रिका
  • सारिका-पत्रिका
  • कथायात्रा-पत्रिका
  • गंगा-पत्रिका
  • इंगित-पत्रिका
  • श्रीवर्षा-पत्रिका

कमलेश्वर ने अनेक हिंदी फिल्मों की पट-कथाएँ भी लिखी हैं। उन्होंने सारा आकाश, अमानुष, आँधी, सौतन की बेटी, लैला, व मौसम जैसी फ़िल्मों की पट-कथा के अतिरिक्त ‘मि. नटवरलाल’, ‘द बर्निंग ट्रेन’, ‘राम बलराम’ जैसी फ़िल्मों सहित अनेक हिंदी फ़िल्मों का लेखन किया।

दूरदर्शन (टी.वी.) धरावाहिकों में ‘चंद्रकांता’, ‘युग’, ‘बेताल पचीसी’, ‘आकाश गंगा’, ‘रेत पर लिखे नाम’ इत्यादि का लेखन किया।

कमलेश्वर का वर्णित विषय -कमलेश्वर की रचनाओं में तेजी से बदलते समाज का बहुत ही मार्मिक और संवेदनशील चित्रण  देखने को मिलता है । वर्तमान की महानगरीय सभ्यता में मनुष्य के अकेलेपन की व्यथा और उसका चित्रांकन कमलेश्वर की रचनाओं की विशेषता रही है। कमलेश्वर सामाजिक रिश्तो के बदलाव  व्यक्ति के एकांकीपन और आंतरिक घुटन को निरूपित करते हैं l

पुरस्कार एवं सम्मान – कमलेश्वर को उनके उत्कृष्ट साहित्य लेखन के लिए  अनेक पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त हुए , जिनमें 2005 में उन्हें ‘पद्मभूषण’ अलंकरण से राष्ट्रपति महोदय ने विभूषित किया। उनकी पुस्तक ‘कितने पाकिस्तान’ पर साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया । 27 जनवरी, 2007 को फ़रीदाबाद, हरियाणा में कमलेश्वर का निधन हो गया।

जॉर्ज पंचम की नाक/George Pancham ki Naak

 प्रस्तुत पाठ एक व्यंग लेख है  , जिसमें लेखक ने  भारतीयों की गुलामी वाली मानसिकता पर कटाक्ष किया है l लेखक के अनुसार एक लंबी  गुलामी  के बाद हम लोग  हमारे वीर क्रांतिकारियों के साहस बलिदान और  सर्वस्व न्योछावर कर देने  की प्रबल राष्ट्रभक्ति भावना के कारण आजाद तो हो गए  , यह आजादी केवल भौतिक रूप तक सिमट कर रह गई  l मानसिक रूप से हम इतना लंबा समय बीतने के बाद भी आजाद नहीं हो पाए हैं  और आज भी हम अपने देश ,  देशवासियों , क्रांतिकारियों  एवं देश में जन्मे महापुरुषों की बजाए  विदेशियों को अपना आदर्श मानते हुए  , उनकी आव – भगत में अपना जमीर तक गिरवी रख देते हैं I यही देश की सबसे बड़ी विडंबना है , जिस पर   लेखक ने इस कहानी के माध्यम से  व्यंग किया है I

पाठ का सार (George Pancham ki Naak)

George Pancham ki Naak : एक बार इग्लैण्ड की  महारानी  एलिजाबेथ द्वितीय  ने अपने पति के साथ भारत के दौरे का मन बनाया और अपने इस दौरे की सूचना भारत सरकार को भिजवा दी। उनके आगमन की चर्चा रोज लन्दन के अखबारों में हो रही थी और जोर शोर से उनके भारत के दौरे की तैयारियां चल रही थी |

रानी  साहिबा हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और नेपाल के दौरे पर कौन-कौन सा सूट पहनेंगी?  इस बात को  लेकर उनका  दर्जी परेशान था।  रानी के भारत आने से पहले उनके सेक्रेटरी  उनकी सुरक्षा व्यवस्था  का जायजा लेने के उद्देश्य से  भारत का दौरा करना चाहते थे।

फोटोग्राफरों की फौज तैयार हो रही थी। इग्लैंड के अखबारों में  प्रतिदिन रानी के भारत  दौरे को लेकर  जो भी खबरें छपती थीं वे सब खबरें दूसरे दिन हिन्दुस्तानी अखबारों में चिपकी हुई नज़र आती थीं I  कभी प्रकाशित होता है कि  रानी ने एक ऐसा हल्के रंग का सूट बनवाया है कि जिसका रेशमी कपड़ा हिन्दुस्तान से मँगाया है  और जिसका खर्च चार सौ पौण्ड आया है।  तो  कभी रानी के नौकरों, बावरचियों, खानसामों और अंगरक्षकों की पूरी जीवनियाँ अखबारों में छपी  होती , यहाँ तक कि शाही महल के कुत्तों की भी तस्वीरें  भारतीय अखबारों में छप गईं। इस तरह शंख इग्लैण्ड में बज रहा था,  और उसकी गूंज हिन्दुस्तान में हो रही थी।

राजधानी में शोर मचा हुआ था। रानी के स्वागत हेतु  देखते ही देखते  दिल्ली   की काया  पलट होने  लगी।

रानी एलिजाबेथ द्वितीय के आगमन को देखते हुए ब्रिटिश हुक्मरानों की मूर्तियों की  साज – संभाल  शुरू हुई ,  तो पता चला कि इण्डिया गेट के सामने स्थित जॉर्ज पंचम की मूर्ति की नाक अचानक गायब हो गई है । देश में बवाल मच गया कि हथियार बन्द पहरेदार पहरेदारी ही करते रहे और मूर्ति से नाक चोरी हो गई। हिन्दुस्तान के जिन लोगों की नाक मूर्तियों से गायब हो गई थी वे तो अजायबघरों में पहुँचा दी गई थीं, किन्तु रानी आएँ और जॉर्ज पंचम की नाक न हो, यह कैसे हो सकता है? चिन्ता बढ़ी, मीटिंग बुलाई गई। सभी चिन्तित थे कि यदि यह नाक नहीं है तो हमारी नाक नहीं रह जाएगी। मीटिंग में हुए निर्णय के अनुसार एक मूर्तिकार को दिल्ली में हाजिर होने के लिए हुक्म दिया गया। मूर्तिकार उपस्थित हुआ, उसने सभी उतरे हुए चेहरे देखे। उनकी बुरी हालत को देखकर मूर्तिकार की आखों में ही आँसू आ गए। 

मूर्तिकार को  कहा गया कि “मूर्तिकार! जॉर्ज पंचम की नाक की  चोरी हो गई है और तुम्हें वह हर हालत में लगानी है  ।” मूर्तिकार ने कहा कि नाक लग जाएगी पर मुझे बताना होगा कि इस लाट का पत्थर कहाँ से लाया गया था? यह सुन सब हुक्कमरानो  ने एक-दूसरे की ओर देखा और क्लर्क को बुलाकर उसे काम सौंपा गया कि पुरातत्व की फाइलें देखकर पता लगाओ कि यह लाट कब , कहाँ बनी और पत्थर कहाँ से लाया गया? क्लर्क ने सभी फाइलें छानमारी पर कुछ पता नहीं चला।

हुक्कमरानो की फिर सभा हई। सबके चेहरे पर उदासी छा गई। फिर एक कमेटी  का गठन करके  जॉर्ज पंचम नाक की जिम्मेदारी उस पर डाल दी गई।

इसके बाद फिर से मूर्तिकार को बुलाया गया। मूर्तिकार ने सभी को आश्वासन दिया कि आप लोग परेशान मत होइए। मैं हिन्दुस्तान के सभी  पहाड़ों  पर जाकर ऐसा ही पत्थर खोजकर लाऊँगा। मूर्तिकार की यह बात सुनकर सभी कमेटी के लोगों की जान में जान आई। तभी वहाँ पर उपस्थित सभापति ने बड़े गर्व से कहा कि – “ऐसी क्या चीज है जो हमारे हिन्दुस्तान में नहीं मिलती है। हर चीज हमारे देश के गर्भ में छिपी हुई है, जरूरत सिर्फ खोज करने की है। खोज करने के लिए मेहनत करनी होगी, इसी मेहनत का फल हमें मिलेगा… आने वाला जमाना बहुत ही खुशहाल होगा।” सभापति का यह छोटा-सा भाषण अगले दिन अखबार में छप गया।

मूर्तिकार पत्थर की खोज में निकल गया। मूर्तिकार कुछ दिन बाद निराश वापस लौटा।  पूरे हिंदुस्तान के पहाड़ों को छान मारा  परंतु उसे वैसा पत्थर कहीं नहीं मिला। उसने सिर झुकाकर खबर दी कि- मैंने ‘हिन्दुस्तान का कोना-कोना खोज डाला परंतु इस तरह के किस्म का पत्थर कहीं भी नहीं मिला। यह शायद विदेशी पत्थर है। सभापति तैश में आ गए, बोले- “लानत है आपकी अकल पर! विदेशों की लगभग सभी चीजों को हम अपना चुके हैं जैसे- वहाँ के लोगों का दिल-दिमाग, वहाँ के तौर-तरीके और उनका रहन-सहन, जब अपने हिन्दुस्तान में बाल-डाँस तक मिल जाता है तो पत्थर क्यों नहीं मिल सकता है ?”

सभापति ने जब मूर्तिकार को फटकार लगाई तब मूर्तिकार ने एक और सलाह देने के लिए इस शर्त पर कहा कि यह बात अखबार वालों तक न पहुँचे। यह सुनकर सभापति की आँखों में कुछ चमक आई और चपरासी से सभी दरवाजे बंद करा दिए। मूर्तिकार ने सलाह दी- “देश में अपने नेताओं की मूर्तियाँ भी हैं, यदि आप लोगों की इजाजत हो और आप सभी ठीक समझें तो मेरा मतलब है तो… जिस भी नेता की नाक इस लाट (मूर्ति) पर ठीक बैठे, उसे वहाँ से उतार लाया जाए।” यह सुनकर सभापति की कुछ खुशी लौटने लगी और उन्होंने धीरे से मूर्तिकार से कहा-“लेकिन बहुत ही होशियारी से।”

मूर्तिकार देश दौरे पर निकल पड़ा। एक के बाद दूसरे प्रदेश, एक मूर्ति के बाद दूसरी मूर्तियों की नाक टटोलने लगा, नापने लगा। दिल्ली से बम्बई पहुँचा। दादाभाई नौरोजी, गोखले, तिलक, शिवाजी, जहाँगीर सबकी नाकें टटोलीं, गुजरात की ओर भागा-गाँधी जी, पटेल, महादेव देसाई की मूर्तियों को परखा और फिर बंगाल की ओर चला-वहाँ गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर, सुभाष चन्द्र बोस, राजाराम मोहन राय सबकी नाकों की नाप ली। फिर बिहार होता हुआ उत्तर प्रदेश आया-आजाद, बिस्मिल, नेहरू, मालवीय की लाटों के पास गया। घबराहट में मद्रास पहुँचा। जहाँ-तहाँ मैसूर, केरल का दौरा करता हुआ पंजाब पहुँचा और लाला लाजपत राय और भगतसिंह की लाटों का सामना किया। और अंत में दिल्ली पहुँचकर अपनी मुश्किल को बताया कि – “मैं पूरे हिन्दुस्तान की परिक्रमा करके आ आया, सभी मूर्तियों को भी देख आया और सबकी नाकों को भी नाप लिया पर जॉर्ज पंचम की नाक इन सभी नाक से छोटी निकलीं।”

हुकुमरान हताश होकर झुँझलाने लगे। मूर्तिकार ने  कहा कि मैंने बिहार सेक्रेटरिएट के सामने सन बयालीस में शहीद हुए बच्चों की मूर्तियाँ स्थापित हैं, शायद बच्चों की नाक फिट बैठ जाए। यह सोचकर वहाँ भी पहुँचा पर उन बच्चों की नाकें भी इससे कहीं बड़ी बैठती हैं। बताइए अब मैं क्या करूँ?

मूर्तिकार हार मानने  वालों में से नहीं था।  और अंत में उसने बंद कमरे में भारतीय हो  हुकुमरानो  से कहा कि  -“नाक लगाना यदि बहुत ही जरूरी है, तो मेरी राय यह है कि चालीस करोड़ जनता में से कोई एक जिन्दा नाक काटकर लगा दी जाए…।” मूर्तिकार की इस योजना को सुनकर चारों तरफ सन्नाटा छा गया। सबको परेशान देखकर मूर्तिकार ने कहा-“आप लोग घबराते क्यों हैं? यह काम आप सब मेरे ऊपर छोड़ दीजिए। नाक को लोगों से चुनकर लेकर आना मेरा काम है। मुझे तो आपकी सिर्फ इजाजत चाहिए।” सभी लोग एक दूसरे से धीरे-धीरे बात करके मूर्तिकार को अनुमति दे दी ।

अखबार में सिर्फ इतना छपा कि नाक की  समस्या का हल हो गया और राजपथ पर स्थित इंडिया गेट के पास वाली जॉर्ज पंचम की मूर्ति की नाक लग रही है।

मूर्ति के आस-पास का तालाब सुखाकर और साफ कर ताजा पानी डाला गया जिससे जिन्दा लगाई जाने वाली नाक सूख न जाए।  रानी एलिजाबेथ के आगमन का दिन आ गया और जॉर्ज पंचम के नाक लग गई, सभी अखबारों में खबर छपी कि जॉर्ज पंचम को जिन्दा नाक लगाई गई है-यानी ऐसी नाक जो कतई पत्थर की नहीं लगती।

जिस दिन जॉर्ज पंचम के बुत पर जिन्दा नाक लगाई गयी उस दिन  देश के सभी अखबार  मौन थे l देश में किसी उद्घाटन की खबर नहीं थी, किसी ने कोई फीता नहीं काटा। कोई सार्वजनिक सभा नहीं हुई। कहीं किसी का अभिनन्दन नहीं हुआ, कोई मान-पत्र भेंट करने की नौबत नहीं आई। किसी हवाई अड्डे या स्टेशन पर स्वागत-समारोह नहीं हुआ। अखबार में किसी का चित्र नहीं छपा। सब अखबार खाली थे। पता नहीं ऐसा क्यों हुआ?

NCERT Solutions of George Pancham Ki Naak/पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास जॉर्ज पंचम की नाक

 

प्रश्न 1. सरकारी तंत्र में जॉर्ज पंचम की नाक लगाने को लेकर जो चिंता या बदहवासी दिखाई देती है वह उनकी किस मानसिकता को दर्शाती है?

उत्तर- सरकारी तंत्र में जॉर्ज पंचम की नाक लगाने को लेकर जो चिंता और बदहवासी दिखाई देती है, उससे उनकी गुलाम मानसिकता का पता चलता है I सरकारी तंत्र आजाद होने के बाद भी उन लोगों  के लिए अपना आत्मसम्मान तक दांव पर लगाने को तैयार हैं , जिन्होंने  शताब्दियों तक भारत को गुलाम बना करके रखा और भारतीयों पर अत्याचार किया I सरकारी तंत्र उन लोगों  के कारनामों को उजागर करके उन्हें नाराज नहीं करना चाहते हैं , बल्कि उनकी जी हजूरी करके उन्हें यह एहसास दिलाना चाहते हैं कि  वह हमारे मालिक थे और हम आज भी उनके गुलाम है I इस प्रकार की मानसिकता किसी भी देश के स्वाभिमान को आघात पहुंचाने वाली होती है I

प्रश्न 2. रानी एलिजाबेथ के दरज़ी को परेशानी का क्या कारण था? उसकी परेशानी को आप किस तरह तर्कसंगत ठहराएँगे?

उत्तर- रानी एलिजाबेथ के दर्जी को यह पता था कि महारानी साहिबा भारत , पाकिस्तान और नेपाल के दौरे पर जा रही हैं और वह यह भी जानता था कि  अलग-अलग स्थानों पर राजसी मर्यादा के अनुसार महारानी साहिबा अलग-अलग  तरह की  पोशाक पहनेंगी  I परंतु दर्जी को इस संबंध में कोई निर्देश नहीं दिया गया था , कि उसे किस प्रकार की पोशाक तैयार करनी है यही कारण था कि दरजी परेशान था I

दर्जी की परेशानी एवं चिंता पूर्णतया तर्कसंगत प्रतीत होती है , क्योंकि अपने देश की गरिमा को बनाए रखने के लिए दर्जी को अपनी महारानी साहिबा के लिए उचित परिधान तैयार करने थे  और अपने द्वारा बनाई गई पोशाक के माध्यम से वह अपनी ख्याति भी चाहता था I हर कोई व्यक्ति अपने कार्य की प्रशंसा एवं ख्याति चाहता है , ऐसा ही दर्जी चाहता था I

प्रश्न 3. ‘और देखते ही देखते नई दिल्ली का काया पलट होने लगा’-नई दिल्ली के काया पलट के लिए क्या-क्या प्रयत्न किए गए होंगे?

उत्तर- नई दिल्ली के कायापलट के लिए  जगह-जगह फैली गंदगी के ढेरों को हटाया गया होगा l चारों और साफ – सफाई करवाई गई होगी  l नालियों को साफ किया गया होगा  l रोड लाइटों को ठीक करवाया गया होगा  l सड़कों के गड्ढे भरवाए गए होंगे l इमारतों को रंग – रोगन करवाया गया होगा  तथा यातायात और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए भारी पुलिस बल चप्पे-चप्पे पर तैनात किया गया होगा l

प्रश्न 4. आज की पत्रकारिता में चर्चित हस्तियों के पहनावे और खान-पान संबंधी आदतों आदि के वर्णन का दौर चल पड़ा है-

(क) इस प्रकार की पत्रकारिता के बारे में आपके क्या विचार हैं?

(ख) इस तरह की पत्रकारिता आम जनता विशेषकर युवा पीढ़ी पर क्या प्रभाव डालती है?

उत्तर-

(क)  पत्रकारिता को समाज के सजग प्रहरी के रूप में देखा जाता है l जिसका कार्य जनसामान्य तक घटनाओं का सही विवरण पहुंचाना , उनका निष्पक्ष विश्लेषण करना तथा जन जागृति का विकास करना माना जाता है  l परंतु कहीं ना कहीं आज पत्रकारिता अपने लक्ष्य से भटक गई है l आज समाचार पत्रों में हमें विभिन्न चर्चित हस्तियों के खान – पान  , रहन – सहन , उनकी रुचि – अरुचि  आदि के बारे में पढ़ने को मिलता है , परंतु उनके चरित्र एवं उनके मानवीय गुणों का विश्लेषण नहीं किया जाता है l मेरी दृष्टि में ऐसी पत्रकारिता  औचित्यहीन एवं दिशाहीन है l

 (ख)  चर्चित व्यक्तियों एवं  सिनेमा जगत के सितारों  की हर छोटी-बड़ी आदत एवं रुचि – अरुचि को समाचार पत्रों में प्रकाशित करना , किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता है l क्योंकि इनके कारण हमारा युवा वर्ग  अपने लक्ष्य से भटक रहा है , उसकी अभिलाषाएं बढ़ रही हैं और  आज का युवा अपने वास्तविक जीवन से अतृप्त होकर अपराध की ओर उन्मुख हो रहा है l अतः इस प्रकार की पत्रकारिता  किसी भी समाज के लिए घातक कही जा सकती है l

प्रश्न 5. जॉर्ज पंचम की लाट की नाक को पुनः लगाने के लिए मूर्तिकार ने क्या-क्या यत्न किए?

उत्तर- जॉर्ज पंचम की लाट की नाक को लगाने के लिए मूर्तिकार ने अनेक  प्रयास  किए। उसने सबसे पहले उस पत्थर को खोजने  की कोशिश की , जिससे वह मूर्ति बनी थी। इसके लिए पहले उसने  पुरातत्व विभाग से संबंधित सरकारी फाइलें ढूँढवाईं।  पत्थर का पता नहीं चल पाने पर  मूर्तिकार ने भारत के सभी पहाड़ों और पत्थर की खानों का दौरा किया।  इसमें  असफल रहने पर मूर्तिकार  ने  सोचा कि क्यों नहीं भारत के किसी महापुरुष की मूर्ति की नाक जॉर्ज पंचम की नाक की जगह लगा दी जाए , इसके लिए उसने भारत के सभी महापुरुषों की मूर्तियों का निरीक्षण करने के लिए पूरे देश का दौरा किया।  परंतु जॉर्ज पंचम की मूर्ति के नाक सभी भारतीय महापुरुषों की मूर्तियों की नाक से छोटी निकली l अंत में  मूर्तिकार ने जीवित व्यक्ति की नाक काटकर जॉर्ज पंचम की मूर्ति पर लगा दी।

प्रश्न 6. प्रस्तुत कहानी में जगह-जगह कुछ ऐसे कथन आए हैं जो मौजूदा व्यवस्था पर करारी चोट करते हैं। उदाहरण के लिए ‘फाइलें सब कुछ हजम कर चुकी हैं।’ ‘सब हुक्कामों ने एक दूसरे की तरफ ताका।’ पाठ में आए ऐसे अन्य कथन छाँटकर लिखिए।

उत्तर- पाठ में आईं ऐसी व्यंग्यात्मक घटनाएँ वर्तमान व्यवस्था  एवं मानसिक वृत्ति पर  कटाक्ष करती हैं ,  जैसे कि

*शंख इंग्लैंड में बज रहा था, गूंज हिंदुस्तान में आ रही थी।

*दिल्ली में सब था… सिर्फ जॉर्ज पंचम की लाट पर नाक नहीं थी। |

*गश्त लगती रही और लाट की नाक चली गई।

*देश के खैरख्वाहों की मीटिंग बुलाई गई।

*पुरातत्व विभाग की फाइलों के पेट चीरे गए, पर कुछ पता नहीं चला।

प्रश्न 7. नाक मान-सम्मान व प्रतिष्ठा का द्योतक है। यह बात पूरी व्यंग्य रचना में किस तरह उभरकर आई है? लिखिए।

उत्तर- नाक  को मान-सम्मान और प्रतिष्ठा का परिचायक  माना जाता है। जॉर्ज पंचम भारत पर विदेशी शासन के प्रतीक हैं। उनकी कटी हुई नाक उनके अपमान की प्रतीक है। इसका अर्थ है कि आज़ाद भारत में जॉर्ज पंचम की नीतियों को भारतविरोधी मानकर अस्वीकार कर दिया गया। रानी एलिजाबेथ के  भारत दौरे की जानकारी मिलने पर  सभी सरकारी अधिकारी अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध अपनी  रोष प्रकट करने की बजाय   उनके स्वागत की तैयारियों में जी – जान से जुट  गए  ।  जॉर्ज पंचम ने भारत के लिए कोई  कोई महान कार्य नहीं किया था और नहीं उनका प्रेम भारत के प्रति था । उनकी आस्था  और भक्ति पूरी तरह  ब्रिटेन की ओर थी। उनकी मूर्ति का पत्थर तक विदेशी था।  उनका भारत के लिए कोई विशिष्ट योगदान नहीं था l यहां तक की उनकी नाक भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों की नाक से नीची थी। इसके बावजूद सरकारी अधिकारी उसकी नाक बचाने में लगे रहे। लाखों-करोड़ों रुपया बर्बाद कर दिया। यहाँ तक कि अंत में किसी जीवित व्यक्ति की नाक काटकर जॉर्ज पंचम की नाक पर बिठा दी गई।  यह घटना भारत के स्वाभिमान और आत्मसम्मान पर एक  गहरी चोट  की जैसी है l

प्रश्न 8. जॉर्ज पंचम की लाट पर किसी भी भारतीय नेता, यहाँ तक कि भारतीय बच्चे की नाक फिट न होने की बात से लेखक किस ओर संकेत करना चाहता है।

उत्तर- जॉर्ज पंचम की लाट पर किसी भी भारतीय नेता, यहाँ तक कि भारतीय बच्चे की नाक फिट न होने की बात से लेखक किस ओर संकेत करना चाहता है  कि जॉर्ज पंचम के मुकाबले भारतीय वीर सेनानियों , यहां तक कि भारत के लिए बलिदान देने  वाले  एक छोटे से छोटे बच्चे  का योगदान भी भारत के लिए  अनुपम है l अतः हम भारतीयों के लिए भी  देश के लिए शहादत देने वाले  क्रांतिकारियों एवं बच्चों का महत्व किसी विदेशी  व्यक्ति से कहीं अधिक होना चाहिए और हमें अपने स्वतंत्रता सेनानियों का हृदय से सम्मान करना चाहिए  और उन पर गर्व करना चाहिए l

प्रश्न 9. अखबारों ने जिंदा नाक लगने की खबर को किस तरह से प्रस्तुत किया?

उत्तर- अखबारों ने जॉर्ज पंचम की नाक की जगह जिंदा नाक लगाने की खबर को बड़ी कुशलता से छिपा लिया। उन्होंने बस इतना ही छापा-‘नाक का मसला हल हो गया है। राजपथ पर इंडिया गेट के पास वाली जॉर्ज पंचम की लाट  पर  नाक लग रही है। ‘ अखबारों में छपा की जॉर्ज पंचम की मूर्ति पर असली नाक लगी है  अर्थात ऐसी नाक  लगाई गई है जो बिल्कुल जिंदा नाक लगती है l

प्रश्न 10. नई दिल्ली में सब था … सिर्फ नाक नहीं थी।” इस कथन के माध्यम से लेखक क्या कहना चाहता है?

उत्तर- नई दिल्ली में सब था, सिर्फ नाक नहीं थी-यह कहकर लेखक स्पष्ट करना चाहता है कि नई दिल्ली भारत की राजधानी है और इस कारण से दिल्ली सभी सुख – सुविधाओं से परिपूर्ण है l  दिल्ली को  भारत के मान – सम्मान के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है l दिल्ली से ही संपूर्ण भारत की शासन व्यवस्था को  संचालित किया जाता है l  दिल्ली में भारत के राष्ट्रपति , प्रधानमंत्री , मंत्रिमंडल के सदस्य तथा उच्च  पदों पर आसीन लोग रहते हैं l बावजूद इसके रानी एलिजाबेथ के आने पर सभी लोग जिस प्रकार उनके  सम्मान में अपने देश की प्रतिष्ठा और गौरव तक को भुला चुके थे ,  उसी बात को लेखक ने  नाक नहीं होने से इंगित किया है  l लेखक यह बताना चाहता है कि दिल्ली में सब कुछ था परंतु  दिल्ली में बैठे लोगों का स्वाभिमान मर चुका था l

प्रश्न 11. जॉर्ज पंचम की नाक लगने वाली खबर के दिन अखबार चुप क्यों थे?

उत्तर- उस दिन सभी अखबार इसलिए चुप थे क्योंकि भारत में न तो कहीं कोई अभिनंदन कार्यक्रम हुआ, न सम्मान-पत्र भेंट करने का आयोजन हुआ। न ही किसी नेता ने कोई उद्घाटन किया, न कोई फीता काटा गया, न सार्वजनिक सभा हुई। इसलिए अखबारों को चुप रहना पड़ा। यहाँ तक कि हवाई अड्डे या स्टेशन पर स्वागत समारोह भी नहीं हुआ।  शायद इस चुप्पी का सबसे बड़ा कारण यह था  कि समाचार पत्रों को यह विदित हो चुका था  कि जॉर्ज पंचम की नाक लगाने के लिए  भारत के हुक्मरानों ने भारत की प्रतिष्ठा और गौरव तक को दांव पर लगा दिया है और यही कारण था कि  आत्मग्लानि के चलते उस दिन अखबारों ने मौन साध लिया था l

अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर

प्रश्न 1. रानी एलिजाबेथ के भारत दौरे के समय अखबारों में उनके सूट के  विषय  में क्या – क्या खबरें छप रही थीं?

उत्तर- रानी एलिजाबेथ के भारत दौरे के समय भारतीय अखबारों में  उनसे  उनसे संबंधित हर छोटी बड़ी खबर  छापी जा रही थी l जो खबरें छप रही थीं उनमें ऐसी खबरें अधिक प्रकाशित होती थीं, जिन्हें लंदन के अखबार एक दिन पूर्व ही छाप चुके होते थे। इन खबरों के  बीच रानी एलिजाबेथ के सूट को लेकर के भारतीय अखबारों में बहुत सारी खबरें छापी गई ।  मसलन उनके सूट का रंग हल्का नीला है l सूट का रेशमी कपड़ा भारत से मंगवाया गया है और इसे बनाने  मैं  करीब चार सौ पौंड का खर्च आया है।

प्रश्न 2. ‘जॉर्ज पंचम की नाक’ पाठ में निहित व्यंग को स्पष्ट कीजिए l

उत्तर-  इस पाठ के द्वारा लेखक ने भारतीय प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली एवं मानसिकता पर तीखा व्यंग किया है| लेखक इस पाठ के माध्यम से यह संदेश देना चाहता है कि हम अंग्रेजों से आजाद तो हो गए हैं परंतु मानसिक दासता के बंधन में आज भी पड़े हुए हैं| आज भी जब कोई विदेशी हमारे यहां पर आता है, तो उसके आने का कारण उसका निजी स्वार्थ तथा उसके देश का हित होता है न कि भारत का हित होता है परंतु  हमारे नेतागण देश के स्वाभिमान को दांव पर रखकर उनकी आवभगत में जुट जाते हैं| उनका यह कार्य देश एवं देशवासियों के आत्मसम्मान पर चोट पहुंचाता है|

प्रश्न 3. जॉर्ज पंचम की नाक की सुरक्षा के लिए क्या-क्या इंतजाम किए गए थे?

उत्तर- जॉर्ज पंचम की नाक की सुरक्षा के लिए हथियार बंद पहरेदार तैनात कर दिए गए थे। चारों ओर सुरक्षा का कड़ा बंदोबस्त कर दिया गया| किसी की हिम्मत नहीं थी कि कोई उनकी नाक तक पहुँच जाए। दिन-रात नाक की निगरानी के लिए पहरेदार तैनात कर दिए गए l  किसी भी व्यक्ति को जॉर्ज पंचम की मूर्ति के पास जाने तक की इजाजत नहीं दी गई| जॉर्ज पंचम की नाक की रक्षा के लिए गश्त भी लगाई जा रही थी ताकि नाक बची रहे।

प्रश्न 4. रानी के भारत आगमन से पहले ही सरकारी तंत्र के हाथ-पैर क्यों फूले जा रहे थे?

उत्तर- रानी एलिजाबेथ के भारत आगमन के समय  सरकारी तंत्र के हाथ पैर इसलिए फूल रहे थे, क्योंकि वह ब्रिटेन की महारानी होने के कारण एक अति विशिष्ट अतिथि थी और उनकी सुरक्षा एक महत्वपूर्ण मुद्दा था| इसलिए उनकी सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए  भारी सैन्य बल की तैनाती के साथ – साथ  किसी भी अनहोनी को घटित होने से रोकने का दबाव भारतीय प्रशासनिक तंत्र पर था| साथ ही जॉर्ज पंचम की मूर्ति की नाक भी गायब हो गई थी और उस मूर्ति की नाक को भारतीय अधिकारियों ने  ब्रिटेन की प्रतिष्ठा पर आघात के रूप में ले लिया था l  ऐसे  में  भारतीय अधिकारी किसी भी कीमत पर उस मूर्ति की नाक को वापस लगाना चाहते थे | जिससे रानी एलिजाबेथ के सामने उन्हें शर्मिंदा नहीं होना पड़े  और यही कारण था कि उनके हाथ पैर फूल रहे थे |

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